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Showing posts from November, 2020

बचपन

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बचपन की बतियां बचपन की गलियां बहुत याद आती है बचपन की सखियां। बचपन का हसना बचपन का खेलना बहुत गुदगुदाता है बचपन का तुतलाना। पापा से डरना मां के आंचल मे छुपना बहुत भावुक करता है मां का नज़र उतारना। दादा का कंधे पर घूमाना दादी का पूये बनाना बहुत तरसाता है दादी का कहानी सुनाना। नीम महुये के पेड़ों पर सावन का झूला झूलना स्वप्निल सा हो गया अब तो सावन का गाना। मां की साड़ी पहन कर लाली बिंदी लगाना बहुत पुराना हो गया गुड़िया गुड्डो का खिलौना। स्कूल न जाना पेट दर्द का बहाना बनाना भाई बहनो से लड़ना झगड़ना रूठना मनाना। बचपन की  नादानियां बचपन की ठिठोलीया  बहुत याद आती है बचपन की पहेलियां।

मणिकर्णिका

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ब्राम्हण कुल में जन्मी,एक कन्या निराली थी। नाम था मणिकर्णिका,मनु नाम से जानी जाती थी। शस्त्र शास्त्र की शिक्षा लेती,अद्भुत चंचल छबीली थी। बरछी ढाल कृपाण कटारी,उसको यही लुभाती थी। युद्ध कला में निपुण,खेल खेल मे रणकौशल दिखलाती थी। गंगाधर राव से विवाह हुआ, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई थी। चहुं ओर बजे ढोल नगाड़े, मंगल बेला आई थी। राजा का स्वर्गवास हुआ, रानी को खुशियां न भायी थी। झांसी पर कब्जा करने की,तब अंग्रेजो ने योजना बनायी थी। अपनी झांसी नही दुंगी, रानी ने मन मे ठानी थी। स्वयं वीरता का अवतार,साक्षात भवानी थी। रणभूमी मे तांडव मचाती,रणचंडी का रुप थी। अंग्रेज़ो की मौत बन,मर्द बनी मर्दानी थी। बुझती झांसी का, आखिरी चिराग थी। युद्ध भूमि मे जब चलती,उसकी तलवार पुरानी थी। पवन वेग से घोङे पर सवार निकल पड़ीं, आजादी की प्यासी थी। अंग्रेजो को  मारते काटते आगे बढ़ती, नारी या दुर्गा का अवतार थी। अदम्य साहस से आखिरी सांस तक लड़ी, स्वतन्त्रता की चिंगारी थी। घायल होकर गिरी सिंहनी,उसे वीरगति अब पानी थी। अमर हो गई इतिहास मे वो, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई थी।

कफ़न मे लिपटकर आना है

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मां अब समय आ गया मुझे युद्ध भूमि मे जाना है। भारत मां पुकार रही उसकी लाज बचाना है।। मां मुझे आज्ञा दो देखो दुश्मन ललकार रहा है। मत जकङो ममता की बेड़ियों मे दुश्मन को मार भगाना है।। मां तूने रग रग मे, देशभक्ति का दीप जलाया है। मां का मोह दिखाकर क्यों तूने कसमें वादो मे बांधा है।। मै तेरा लाल हूं फिर लौटकर मुझको आना है। यूं न मुझको कमजोर बना मुझे दूध का कर्ज चुकाना है।। मां आंखों से आंसू न बहाओ पिता का यूं न अपमान करो। याद करो पिता को दिया हुआ वचन जिन्होंने देश की खातिर सब कुछ वार दिया।। अब मेरी बारी है मातृभूमि का फर्ज निभाना है। जिन्दा न आ सका तो कफ़न मे लिपटकर आना है।।

विध्ंहर्ता गणपति बप्पा मोरया

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जय गणपति बप्पा मोरया.... तुम्हरे जैसा कोई ना! गौरा के हो राज दुलारे! भ्राता कार्तिक के अति प्यारे! शिव की आंखों के तारे! जय गणपति बप्पा मोरया.... तीक्ष्ण बुद्धि प्रखर ज्योति! माता पिता के चक्र पूरकर! चरणों मे आशीष नवाकर! माता पिता को ब्रम्हांड बताकर! सर्वप्रथम पूजनीय कहलाए! जय गणपति बप्पा मोरया.... मूषक की सवारी करते! मोदक बड़े चाव से खाते! विध्न सब हर ले जाते! भक्तो पर कृपा बरसाते! चार भुजाधारी कहलाते! जय गणपति बप्पा मोरया.... रिद्धि सिद्धि के तुम दाता! हमारे हो भाग्य विधाता! तुम्हारी शरण मे जो आ जाता! सभी मनोरथ पूरा हो जाता! शुभ लाभ मंगल करता! जय गणपति बप्पा मोरया....

हम भारत की बेटी

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शरहद पर मरना जानती दुश्मनों को चीरकर आगे बढ़ना जानती देश पर कुर्बान हो जाती।। हम भारत की बेटी........ तूफानों से नही डरती अंगारों पर भी चलती मन मे शूल पड़े तो चट्टानों से टकरा जाती।। हम भारत की बेटी...... नसीबों से दुनिया मे आती सौभाग्य से पाली जाती हौसलों से राह तराशती हर क्षेत्र मे पहचान बनाती।। हम भारत की बेटी ....... संस्कारो मे पाली जाती माता पिता पर जान लुटाती हर फर्ज बखूबी निभाती दो कुलो को संवारती।। हम भारत की बेटी......

मुझे आसमां छूने दो

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मुझे आसमां छूने दो मेरे अरमानों को उड़ने दो मैं कोई पक्षी नही जो मेरे पर कतर दो मुझे आसमां छूने दो।। तुम्हारी तरह मेरे अंदर भी मेरा मन मेरी आत्मा है मेरी सांसें चलती है मुझसे कुछ कहती है मुझे आसमां छूने दो।। तुम्हारा कोई हक नही बनता मुझे जन्म से पहले ही मार दो बंधनों के नाम पर मुझे बेड़ियों में बांध दो मुझे आसमां छूने दो।। तुम भी इस जग मे आए हो मैं भी इस जग मे आई हूं तुम अपने काम करो मुझे मेरे काम करने दो मुझे आसमां छूने दो।। मैं सागर का वो किनारा हूं जिसका कोई अंत नही है मेरे बिना तुम भी अधूरे तुम्हारे बिना मैं भी अधूरी मुझे आसमां छूने दो।।

बेटी को पराया धन न कहना

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बाबुल के बगिया की चिरैया हूं एक दिन बिन पंख उड़ जाऊंगी। बाबुल के घर आंगन को सूना कर यादों की पोटली संग घर से विदा हो जाऊंगी। मन व्यथित कर देता ये कैसी रीत जहां की? बेटी को पराया कर देता ये कैसी प्रीत पिता की? लाड़ प्यार से पाला पोसा आत्मनिर्भर बनाया पराया धन कहके पल भर मे पराया कर डाला। आंखें रोई तो मन भी रोया होगा मैया कैसे तुमने दिल को समझाया होगा। मुझे तो प्रथा समझकर निर्वाह दिया अपनों से पराया करके पराए संग बांध दिया। बाबा तुम ही बताओ तुम बिन कैसे रह पाऊंगी? जब क्षण भर को अपनी आंखों से ओझल नही करते थे। मेरे अरमानों को अब कौन पूरा करेगा? बेटी को तो अपने घर का मेहमान बना दिया। बाबा तुम्हारे प्यार को तरसुगी मैया के आंचल की छांव को तड़पुगी। बेटी हूं तुम्हारी बस यही चाह है मेरी बेटी ही कहना न पराया धन कहना कभी। मन व्यथित कर देता ये कैसी रीत जहां की? बेटी को पराया कर देता ये कैसी प्रीत पिता की? बाबुल के बगिया की चिरैया हूं.......