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इम्तहान

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रेत के महल अक्सर, लहरों संग बह ही जाते है। उम्मीदे टूट कर बिखर गई तो क्या? अभी हौसलों की उड़ान बाकी है।। कांच के सपने अक्सर, टूट ही जाया करते हैं। एक सपना टूट गया तो क्या? अभी नया सपना देखना बाकी है।। मंजिल की चाह मे अक्सर, सबकुछ भूलना पड़ता हैं। तुमको नही जानता कोई तो क्या? अभी खुद से खुद की पहचान बाकी है।। भीड़ में चलने वाले अक्सर, भीड़ में ही खो जाते हैं। अकेला चलना पड़ा तो क्या? अभी असली पहचान बनाना बाकी है।। एक ढर्रे पर चलने वाले अक्सर, एक दायरे मे सिमट जाते हैं। तूफानी राहों पर चलना पड़ा तो क्या? अभी जिन्दगी के कई इम्तहान बाकी है।।

सपने करती साकार

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तू नदियां के धार सी, कलकल करती जाती है। बिना किसी से आस लगाए, निरन्तर चलती जाती है।। हिरणी सी कुलांचे मारती, घर आंगन बुहारती है। भोर से निशा तक, सबके सपने बुनती है।। अपने सपने भीतर, रखती है संजोकर, इसी उम्मीद के साथ। दायित्वों का निर्वाह कर, करूंगी सपने पूरे अपने अपने आप।। नेत्रो मे उमंग, हदय मे तरंग। प्यारी मुस्कान संग, निभाती सब फर्ज।। घात प्रतिघात सहती, आर्थिक मार भी सहती। तनिक उफ़ ना करती, सब संतुलित कर लेती।। विद्ता का पर्याय बन, सही गलत का बोध कराती। परिवार की ढाल बन, खुशियों की गंगा बहाती।। पूरे करती सबके अरमान, हो जाए सपना साकार। ना रहे कोई दुखी, हो जाए सब सुखी।। देकर मजबूत आधार, संवारती घर - द्वार। सब्र धीरज धैर्य की बन मिसाल, अपने भी सपने करती साकार।।