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Showing posts from June, 2022

जलियांवाला बाग हूं

मैं जलियांवाला बाग हूं, डायर की कायरता का साक्षी हूं। क्या हुआ था जलियांवाला बाग मे? आज फिर याद दिलाने आया हूं।। भारत के,पंजाब प्रान्त के अमृतसर मे, स्वर्ण मंदिर के निकट,जलियांवाला बाग मे। तेरह अप्रैल उन्नीस सौ उन्नीस,बैसाखी का दिन, सभा चल रही थी ,रोलट एक्ट के विरोध मे।। आजादी का आंदोलन कुचलने को, रोलट एक्ट कानून बनाया सरकार ने। और अधिक अधिकार दे दिए , ब्रिटिश सरकार को बिल मे।। बिना मुकदमा बिना वारंट के, भारतीयो को बंद करते जेल मे। पूरा भारत खड़ा हुआ इसके खिलाफ, छेड़ दिया आन्दोलन जलियांवाला बाग मे।। डायर नब्बे सैनिको संग, पहुंच गया बाग में। बिना चेतावनी निहत्थो पर, सैनिक गोलियां चलाने लगे।। दस मिनट एक हजार छ सौ पचास, राउंड गोलियां दागी सैनिकों ने। भागने का कोई रास्ता नही था, मासूम जान बचाने कूद पड़े कूंए में।। हजारो बच्चे बूढ़े नाबालिग, छ सप्ताह का बच्चा मारे गए। लहू लुहान हो गई थी धरती, निरपराध मासूमो के खून से।। भारतीयो का खून उबलने लगा, डायर के इस जघन्य अपराध से। ऊधम सिंह ने डायर की हत्या कर दी, 1940 लंदन के कैकंसटन हाल में।। वीर शहीदो के सम्मान मे, आज भी सीना ताने खड़ा हूं। हां मैं...

वक्त से मुलाकात

राह मे एक दिन, वक्त से हुई मुलाकात। वक्त है चलता ही जाता, रूकता नही एक भी बार।। वक्त के होते दो रूप, अच्छा वक्त बुरा वक्त। अच्छा वक्त पल मे कट जाता, बुरा वक्त काटे नही कटता।। अच्छे वक्त का सभी, करते है इन्तजार। बुरा वक्त कभी ना आए, किसी के जीवन मे एक भी बार।। वक्त ने कहा मेरे दो रूप, दोनो एक सिक्के के दो पहलू। सुख के बाद दुख आएगा, दुख के बाद सुख आएगा।‌। यह है कड़वा सच, जो दुख मे धीरज धैर्य धरते। कभी नही विचलित होते, वही निरन्तर आगे बढ़ते।। जो नही चलते वक्त के साथ, वही शिकायत करते बार बार। जो चलते वक्त के साथ, वक्त चलता उनके साथ।। वे छू लेते आसमान, रच देते है नया इतिहास। पूरा आसमान भी उनका, कारवां भी चलता उनके साथ।।

सफलता यूं ही नही मिलती

सफलता यूं ही नही मिलती! अंगारों पर चलना पड़ता है! रातों को जगना पड़ता है! नींदो को तजना पड़ता है! जग को भूलना पड़ता है! गिर कर संभलना पड़ता है! संभलकर चलना पड़ता है! हौसलों के पंख लगाकर! इरादों को फौलाद बनाना पड़ता है! सफलता यूं ही नही मिलती!

बहादुर बेटियां

पिता ने देश की खातिर,अपना लहु बहाया। प्राणो की आहुति देकर, तिरंगे को कफन बनाया।। मेरी बेटियों वीर सिपाही बनना,मेरी यही कामना। तिरंगे को ना झुकने देना, तिरंगे का मान रखना।। गुड़िया गुड्डो से खेलना, बेटियों ने छोड़ दिया। बन गई वीर सिपाही, मां का हृदय कांप गया।। मां क्यों घबराती हो,तुम्हारी बहादुर बेटियां है हम। हमारे बाजुओं मे है दम,हौसले नही किसी से कम।। दुश्मनों को मार भगाएंगे,सबका मिसाल बन जाएंगे। कतरा-कतरा लहु बहाएंगे,देश की माटी का तिलक लगाएंगे।। भारत का परचम लहराएंगे,शान से तिरंगा फहराएंगे। मां तेरा नाम रोशन कर जाएंगे,आंचल मे आकर सो जाएंगे।।

तिरंगा न झुकने देंगे

वतन की माटी को माथे तिलक लगाकर। मां तेरे चरणों की सौगंध खाते हैं हम।। सिर कटा देंगे पर तिरंगा न कभी झुकने देंगे। दुश्मनों के होश उड़ा देंगे तेरी आबरू न लुटने देंगे।। हम हैं वीर सिपाही शान से तिरंगा लहराएगे। भारत की आजादी की चमक धुमिल न होने देंगे।। महापुरुषों के बलिदान को जाया न होने देंगे। कतरा कतरा लहु का देश पर कुर्बान कर देंगे।। मरेंगे देश के लिए जिएंगे देश के लिए। देश के गद्देदारो को तार तार कर देंगे।। मेरा देश सोने की चिड़िया बन जाए। देश भक्तो की फौज खड़ी कर देंगे।। वन्देमातरम जय हिन्द के नारो से मेरा देश गूंजे। मेरे देश का तिरंगा युगो युगो तक लहराए।।

पिता घर की पहचान

आंधी आए आए तूफान, पिता हैं वट वृक्ष की छांव। धीर-गंभीर खड़े चट्टान बन, देते सहारा शाखा फैलाकर।। अन्तर्मन में अति कोलाहल, रहते अब्धि-सा शांत हरदम। भाल मार्तण्ड-सा प्रबल, चित्त मयकं - सा शीतल।। रखते सदा अनुशासन, घर में उनका प्रशासन। नही रखा कभी बंदिश, पैरों में न बांधी जंजीर।। संस्कारों की वह पाठशाला, वह पक्की ईंट की दीवार, मां का वह अभिमान, कुटुंब का स्वभिमान।। निराशा में भी आशा, वह प्यार की परिभाषा। अप्रदर्शित उनका प्यार, जैसे अनंत आकाश।। बच्चों का वह खिलौना, मीठे सपनो का बिछौना।। बन जाए काठी का घोड़ा, सुनाएं कहानी सलोना।। परिवार का  वह संबल, प्यार उनका जैसे चंदन। बिन उनके ना कोई आस, वही आखिरी विश्वास।। बच्चों की वह हिम्मत, वही खुला आसमान। पिता घर की पहचान,बिन उनके ना जीवन आसान।।

आदिदेव महादेव

हे आदिदेव महादेव, आ जाओ धर अवतार। अब नही सम्भलती दुनिया, बढ़ रहा अत्याचार।। चारो ओर अतिक्रमण,  चरम पर है भ्रष्टाचार। धोखा फरेब हर जगह, स्वार्थी हो गया संसार।। हे शिवशम्भू अर्द्धनारीश्वर, अब तो खोलो त्रिनेत्र, देखो नारीयों पर अत्याचार। बच्चियों का हो रहा शोषण, हर जगह बढ़ रहा व्यभिचार।। हो गया सड़क पर चलना दूभर, है भेड़िए की खाल मे हर इंसान। किस पर भरोसा करें,किस पर ना करें, पुरूष बनता जा रहा वहशी हैवान।। हे जटाधारी त्रिपुरारी शिव शंकर, करो तांडव मचा दो हाहाकार। लेकर त्रिशूल धरो रौद्र रूप, कर दो दरिंदों का नरसंहार।। हे नीलकंठ करो विषपान, जगत मे जितना है विषव्याप्त। लादो प्रलय! करो उन्माद, पापीयों का हो जाए नाश।। यह सृष्टि हो जाए, फिर से सुदृढ़ शांत। सबके दिलो मे बसे प्यार, भोले बाबा की हो जयकार।।

अनाथ बच्चे

हम सब बच्चे अनाथ, सोते हैं फुटपाथो पर। अम्बर की चादर ओढ़े, आंखों मे सपने हजार लेकर।। कोई नही हमारे साथ, फिर भी मन मे है विश्वास। पढ़ने की तमन्ना लिए, करते हम ढाबो पर काम।। हममें भरा है जोश, कुछ कर गुजरने का। फिर भी फोड़ते हम, ईंट पत्थर सड़कों का।। है हमारे कंधों पर, जीवन का एक बोझ। जब काम नही मिलता, मांगते भीख मजबूर होकर।। खो रहा बचपन हमारा, दर-दर भटकते-भटकते। अनाथ के साए मे अक्सर, अपराध में हम लिप्त हो जाते।।

बालश्रम

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गरीबी ने किया मां को मजबूर, अबोध तनय बन गया मजदूर। मां की आंख नम, ममता भी रोती है, नन्ही गुड़िया जब जूठे बर्तन धोती है।।१ ना मिली आंचल की छाॅ॑व, ना मिला बाबा का ठाॅ॑व। क्या जानू कैसी होती लोरी? क्या जानू कांधे की घोड़ी?२ गली कूचों में घूमता रहता, लेकर किस्मत मैं खोटी। बेदर्द जमाना समझे ना, मुंह पर फेंके बासी रोटी।। काला है कर मैला है तन, घृणित नजरो से देखें जन। कोई ना बोले मीठे बोल, लाचार चोर समझे हर मन।।४ कैसी होती है परी कहानी? कैसा होता है भोला बचपन? कैसे पकड़ते कलम दवात? कैसे लिखते कागज पर सच?५ जी करता बन जाऊं कलाम, लेकर कलम लिखूं कलाम  पंख पसार उड़ूं आसमान, बन जाऊं मैं भी विद्वान।।६ भर आया हदय में ज्वार, आंखो से उगले अंगार। नादान करे खुदा से प्रश्न, कैसे भरे हैं जीवन में रंग ?७ मासूम के सपने चढ़ गए, सब बालश्रम की भेंट। बच्चों को कहते हैं भगवान, भगवान जी रहा खाली पेट ।।८

बत्ती गुल

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कल दिन रात जब , बत्ती हो गई गुल। टीवी मोबाइल कम्प्यूटर छोड़, सब बैठे एक दूजे संग फुल।। ना वाट्स अप पर, आया कोई मैसेज। ना फेसबुक ने भेजा, कोई नोटिफिकेशन।। सबने अपनी अपनी कही, फिर खूब लगे ठहाके। याद आया गुजरा जमाना, तब कैसे होते थे याराने।। सब हो गए बातों में मशगूल, ना लगी किसी को भूख। काम की हो गई छुट्टी, औरतो को मिल गई जनम घुट्टी।। दिल हो गए सबके साफ, जिसपर बरसों से पड़ी थी धूल। भला हो उस बिजली वाले का, जिसने बत्ती कर दी गुल।।

भोर हुई अम्मा

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भोर हुई अम्मा जागी, अम्मा जागी भोर हुई। यह थी एक पहेली? पहले अम्मा जागी या भोर हुई।। पीत वस्त्र पहन दिनकर, फैलाता स्वर्ण रश्मियां। स्नान करके आती अम्मा, पढ़ती रामचरितमानस चौपाइयां।। धूप अगर बारती, आरती करती अम्मा। नन्हे मुन्ने उठ जाते, कर जोड़ करते वंदना।। गृह कार्य मे लग जाती, भेजकर बच्चो को स्कूल। खेत से लाती सब्जियां, बनाती खाना स्वादिष्ट खूब।। ची ची करती चिड़िया, दाना पानी देती अम्मा। धेनु रम्भाती पास बुलाती, दूग्ध दुह कर लाती अम्मा।। भोर की किरणों सी, मिठी बातें तेरी अम्मा। भोर की शीतलता सी, आंचल की छांव अम्मा।।