आत्मसंतोष
बेसुमार धन दौलत, अर्जित किया जब। पग पग अहंकार भी, घर आया तुम्हारे तब।। फूल कर छाती हो गई चौड़ी, अप्रिय हो गए बोल भी अब। हंसना तिरस्कार करना, हो गई तुम्हारी आदत बस।। शोहरत की चकाचौंध मे, ना रहा अपनो का भान। तुच्छ लगने लगे सभी, ना रहा बड़ों का सम्मान।। बंगला गाड़ी मखमली विस्तर, इसी को कहते हो सुख सम्राज।। आधुनिकता को अपनाकर, संस्कारो का कर दिया बहिष्कार।। रात दिन का चैन लुटा, मन कस्तूरी सा रहा भाग। रोको रोको सोचो सोचो, मानव कहां जा रहा आज।। बढ़ती लालसा जिजिविषा पर, लगाओ तुम अपने लगाम। असली पूंजी है आत्मसंतोष, इसको कर लो आत्मसात।।