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Showing posts from May, 2022

आत्मसंतोष

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बेसुमार धन दौलत, अर्जित किया जब। पग पग अहंकार भी, घर आया तुम्हारे तब।। फूल कर छाती हो गई चौड़ी, अप्रिय हो गए बोल भी अब। हंसना तिरस्कार करना, हो गई तुम्हारी आदत बस।। शोहरत की चकाचौंध मे, ना रहा अपनो का भान। तुच्छ लगने लगे सभी, ना रहा बड़ों का सम्मान।। बंगला गाड़ी मखमली विस्तर, इसी को कहते हो सुख सम्राज।। आधुनिकता को अपनाकर, संस्कारो का कर दिया बहिष्कार।। रात दिन का चैन लुटा, मन कस्तूरी सा रहा भाग। रोको रोको सोचो सोचो, मानव कहां जा रहा आज।। बढ़ती लालसा जिजिविषा पर, लगाओ तुम अपने लगाम। असली पूंजी है आत्मसंतोष, इसको कर लो आत्मसात।।

मै गंगा मां हूं

#करू ण रस से ओत-प्रोत स्वर्ग से उतरी हूं!मैं हूं बहती धारा! तुम मुझे मानो तो जग है मुझमें सारा!              हां गंगा मां हूं!               मैं गंगा मां हूं! धरती को पावन करती! मैं निर्मल शीतल बहती! जन जन की प्यास बुझाती! धीरज धैर्य की चादर ओढ़े! ममता का सागर कहलाती!     सबके पाप हूं धोती! स्वर्ग से उतरी हूं!मैं हूं बहती धारा! तुम मुझे मानो तो जग है मुझमें सारा!              हां गंगा मां हूं!               मैं गंगा मां हूं! शिव शम्भु की जटा मे शुशोभित! गंगोत्री से बंगाल की खाड़ी तक! मेरी अविरल धारा बहती! मै गंगोत्री, यमुनोत्री, मंदाकिनी,भागिरथी! मैं ही सरस्वती कहलाती!    तुम्हारे कुकर्मो से-- अदृश्य हो गई सरस्वती! स्वर्ग से उतरी हूं!मैं हूं बहती धारा! तुम मुझे मानो तो जग है मुझमें सारा! ...

दाता भाग्य विधाता

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किस राह पर चलूं? किस डगर पर पग धरूं? कुछ ना समझ में आए, असमंजस में जी घबराए।। ओ मेरे दाता, भाग्य विधाता। तू ही मेरी उलझन सुलझा दे, अब तो कोई रस्ता दिखा दे।। मैं हारा नही, हौसलों मे भी कमी नही। संघर्ष करता रहा, विफल ही होता रहा। ओ मेरे दाता, भाग्य विधाता। कहां मुझसे चूक हुई? कहां मुझसे भूल हुई? रोशनी की किरण दिखा दे, बुझते मन का दीपक जला दें। करूंगा मेहनत ना पीछे हटूंगा, अपनी कृपा मुझ पर बरसा दे।। ओ दाता, भाग्य विधाता। मेरी नैया अब तू पार लगा दे, मेरी नैया अब तू पार लगा दे।।

रिश्तों मे गांठ

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जब स्वार्थ लोभ का पर्दा, आंखों पर पड़ गया हो। जब अहंकार का दानव, हदय मे घुस गया हो।। जब खास उद्देश्य से बोले, मधुर - मधुर वचन वो। जब हर कार्य के पीछे, अपना ही मकसद साधे वो।। जब करें दिखावा अपने पन का, शब्दो के जाल नित बुने वो। जब  स्वयं  को  श्रेष्ठ, दूजे को निरिह समझे वो।। जब कटु वचनो से, मन घायल करें वो। जब तेरा - मेरा का, ही राग अलापे वो।। तब.... तब टूट जाता है, सब्र का बांध। और पड़ जाती है, रिश्तों मे गांठ।।

बेच दिया अपना इमान

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देश पर जब भी होगा अत्याचार, मैं कलम की धार से करूंगी उस पर वार। नं रूकूंगी न थकूंगी बार-बार लिखूंगी, क्यों बेचते हो चंद सिक्कों में अपना इमान? जब देश फूलेगा तुम भी फूलोगे, जब देश न रहेगा तुम भी न रहोगे। इतिहास गवाह है जिसने भी की गद्दारी, उसका हमेशा ही नामों निशान मिटा है।। करोड़ों लूटकर दूसरे देश जब जाओगे, अपने देश का क्या हाल सुनाओगे। चोर नज़र से बार-बार देखे जाओगे, वहां भी तुम कपटी चोर ही कहलाओगे।। इसलिए कहती हूं ले लो संज्ञान, नही तो तुम भगोड़ा कहलाओगे। नजरें चुराओगे,बार-बार पछताओगे,फिर कहोगे! क्यों बेच दिया चंद सिक्कों के लिए अपना इमान।।

मां अचला बोली

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वीरो की शहादत पर आज मां अचला पहुंची, देख वीरों की शहादत कुछ इस तरह मचली। बोली धन्य है वीरो धन्य तुम्हारी जन्मदात्री, कैसे चुकाऊंगी यह ऋण ? कृतज्ञ हूं तुम्हारी।। शत् शत् नमन करती तुम्हें मां भारती, जले जगमग दीप उतारूं तुम्हारी आरती। अमर हो गए तुम,मुझमे दफन हो गए तुम, धन्य हुई मेरी कोख धन्य हुई मां भारती।। निज प्राणो की चिन्ता ना तुम्हें कभी सताती, सीमाओ की रक्षा करते अहि का सीना चीर। उत्तुंग शिखर पर डटे रहते हो पाषाण बन, देश पर बुरी नजर डाले अरि की ऐसी नही तासीर।। तुमसे ही सलामत यह धरती है, तुमसे ही आती माटी मे खुशबू है। तुमसे ही लहर लहर लहराए तिरंगा, तुमसे ही पावन आकाश और गंगा।।