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Showing posts from June, 2021

कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक बन गया महान

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धौली की पहाड़ी पर हुआ कलिंग संग्राम, युद्ध जीत गया अशोक सम्राट। कलिंग राजा अनंत पद्मनाभन मारा गया, परंतु कलिंग द्वार अब भी ना खुला।।१।। अशोक ने कलिंग द्वार की ओर रूख किया, बज रही दुदुम्भी जय जयकारा गूंज रहा।  कलिंग द्वार खुल गया ,  सैन्य वेश मे घोड़े पर सवार खड़ी थी पद्मा।।२।। युद्ध के लिए ललकार रही, दुर्गा भवानी सा हुंकार रही। हे सम्राट उठाओ हथियार, और हमसे करो युद्ध।।३।। स्त्रियों पर शस्त्र उठाना, शास्त्रानुसार है अधर्म। हे कलिंग वीरांगना, मैं नही करता अन्याय।।४।। मासूमों की हत्या करना, क्या नही है अधर्म? तुमने न्याय अन्याय की चिंता अब की है? लाखों निर्दोषो को उतार दिया मौत के घाट।।५।। सिर झुकाए क्यों खड़े हो? देखो कैसे रणभूमी है लहूलुहान? मेदनी हुई शोणित कीच,  दया नदी है रक्तरंजित।।६।। हे महीप कलिंग विजय कर, कर लिया साम्राज्य विस्तार। बना लिया अखण्ड भारत, क्या शबो पर करेगा शासन?।।७।। छाया है चहुं ओर मातम, इतिहास करेगा तुझसे सवाल। कहां है आंखो का आलोक? क्या कहेगा सम्राट अशोक?।।८।। टूट गई हाथो की चूड़ियां, मिट गया मांग का सिंदूर। छिन गया आंख का आलोक, असमय अना...

चकवा चकवी का दर्द

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सुनहरा रंग मंजुल पर, शाश्वत प्रेम प्रतीक चकवा चकवी। दोनो युगल प्रेम मे मगन, दिन भर खेलें अठखेली।।१।। दिन ढलने लगा रात होने लगी, न जाने क्यों दोनों हुए व्याकुल? अभिशापित चकवा चकवी, एक दूजे से हो गए विमुख।।२।। एक नदी के इस पार, दूजा नदी के उस पार। दिल मे दर्द कसक टीस संग, विरह मे कट रही काली रात।।३।। वियोगिन गा रही विरह गीत, झर झर बह रहे नयनो से नीर। दोनो एक दूसरे को पूकारते, तड़प तड़प कर रात बिताते।।४।। सूर्योदय हुआ, बन्द हुआ उनका क्रनंदन। चकवा चकवी फिर मिले, जैसे जल रहे हो प्रेम अगन।।५।। बन्द कर दो पिंजरे मे अगर,सूर्यास्त  होते ही हो जाते विलग मगर। एक का मुख पूरब की ओर, दूजे का मुख पश्चिम की ओर।।६।। हर रात विरक्त हो जाते, पर प्रेम न किंचित होता कम? भोर होते ही प्रेम परवान चढ़ता, चकवा चकवी का प्रेम निश्छल।।७।। कोई न मारो इनको, विरह के मारे हैं। जी लेने दो इनको, रात भर हर पल मरते हैं।।८।।

पन्ना धाय का बलिदान

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जल रहा था चित्तौड़ किला, आन्तरिक विरोधो षणयन्त्रो से। माता कर्मावती को संशय हुआ, भावी राणा का जीवन खतरे में।।१।। पुत्र उदय सिंह को सौप दिया, पन्ना धाय के आंचल मे। पन्ना इस कुल की रक्षा कर, मेवाड़ राजवंश है खतरे मे।।२।। पन्ना ने वचन दिया, निज कुंवर पर न आंच आने दूंगी। दे दूंगी अपने प्राण पर, मेवाड़ का कुलदीपक न बुझने दूंगी।।३।। दुष्ट क्रूर दासी पुत्र बनवीर, सत्ता लोभी था व्यभिचार। काली रात का साया बन, मंडरा रहा था मेवाड़ पर।।४।। बनवीर पागल हाथी सम, चल पड़ा रक्तरंजित तलवार लिए। आंखो मे खूनी ज्वाला भर, चल पड़ा राणा का लहू पीने।।५।। विश्वस्त सेवक ने दिया सन्देश, पन्ना धाय बनवीर आ रहा यमवेश। पन्ना न किंचित भयभीत हुई? अडिग चट्टान बन खड़ी हुई।।६।। नज़रें फेरी उदय चंदन पर, उदय चंदन लग रहे थे पूरक। मन में विचार कौंध गया, क्यों न बना दूं चंदन को उदय?७।। बांस की टोकरी मे, झटपट उदय को सुला दिया। ऊपर झूठे पत्तल रखकर, कीरतबारी ने किले को पार किया।।८।। फिर आंख के तारे को, बिछौने से उठा सीने से लगा लिया। राजसी वस्त्राभूषण पहनाकर, उदय सिंह के पलंग पर सुला दिया।।९।। कहां है उदय? कहां है राणा...

हाड़ी रानी की अंतिम निशानी

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यह कहानी सलुम्बर के सरदार राव रतन  सिंह चुण्डावत तथा हाड़ी रानी की है।जिसे मैंने कविता मे पिरोने की कोशिश की है। मुझे उम्मीद है कि रचना को पढ़कर आपको ऐसा लगेगा जैसे आपने पूरी कहानी पढ़ ली। सुनो सुनाऊं एक कहानी, हाड़ी रानी चुण्डावत राव की। मेवाड़ का थी वो अभिमान, नारीयों का स्वाभीमान थी।।१।। न हाथों की मेहंदी छूटी, न छूटा पैरों का महावर था। राणा का सन्देश लेकर, द्वार पर खड़ा सन्देशवाहक था।।२।। वीरवर! अविलंब सैन्य टुकड़ी लेकर, रोको औरंगजेब की सेना को। विलंब न करते हुए सरदार ने, कूच करने का दिया आदेश सेना को।।३।। केसरिया बाना पहने वीरवेष मे, अन्तिम विदाई हेतु पहुंचा सरदार। रानी चौकी,थी अचंभित, कहा क्षत्राणियां इसी दिन का करती इन्तजार।।४।। फिर भेंट हो न हो, सरदार का मन आशंकित था। कहीं प्रियतमा न दे बिसार, चुण्डाराव का मन सशंकित था।।५।। दोनो की आंखें थी भरी, एक दूजे से अश्रु छुपा रहे। रानी ने प्रियतम को विदा किया, अधरो पर मुस्कान लिए।।६।। आप करें विजय श्री प्राप्त, हमारा जन्मजन्मांतर का साथ। जीवन के अंतिम क्षण तक, प्रियवर करूंगी आपका इंतजार।।७।। सरदार हवा से बातें करता, पवन ...

हुनर को दें धार

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क्यों हार कर बैठ गया, क्यों मन मारकर बैठ गया। असफलताओं से लेकर सबक, मंजिल की ओर आगे बढ़।। माना दरिया तूफानी है, क्या तेरा हौसला पानी है? मन के झरोखे मे देख झांककर, अभी तेरे खून मे रवानी है।। क्यों कुंठाओ से घिर गया? क्यों माना जीवन मे है अंधेरा? जैसे नन्हे दीप मिल करें दिवाली, वैसे ही फूट पड़ती अंधियारे मे लाली।। कुंठाओ को त्यागकर, उम्मीद का दिया जला।। जैसे अंधेरी रात को पड़ता है ढलना, निश्चित होता है सूरज का रोज निकलना।। निरंतर प्रयास करना होगा, अंधेरो से डट कर लड़ना होगा। अपने हुनर को धार देना होगा, तभी मंजिल पाने मे सक्षम होगा।।

आने वाला कल

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आने वाला कल कैसा होगा? सोच कर सिहर जाती हूं। मेरी कलम भी परेशा रहती है, अक्सर मुझसे यही कहती है। बेधड़क लिख दो कि.... आने वाला कल कैसा होगा? न घर बचेगा,न वन बचेगा, न अन्न बचेगा,न जल बचेगा। न तन ढकने को वस्त्र होगा, जहरीली हवाओं का बसेरा होगा। नभ से झर-झर अंगार बरसेगा, स्याह-वेकल मन सड़कों पर बेचैन पड़ा होगा। हे मनुज तोड़ दो मिथ्याभिमान, अभी भी वक्त है संभल जाओ। झूठा साबित कर दो जो कहते हैं, आने वाला कल ऐसा होगा। चलो लौट चलें वेदों की ओर, रंग दे धरा को धानी रंग से। बचा ले प्रकृति और बेजुबानों को, बचा ले यह जीवन है जो अनमोल। कलयुग काला है तोड़ दो इस भ्रम को, चलो सत्कर्मों से कलयुग में, काला नही हरा रंग भर दे। उठाओ तुलिका वसुंधरा को फिर से रंगीन कर दो, फिर से सर-सर मधुर पवन बहे, मेघ झम-झम बरसात करें। उदास कलम पुलकित हो जाए, आने वाला कल खुशियों से भर जाए।