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Showing posts from June, 2023

रानी पद्मावती का जौहर

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सुनो सुनाऊं एक दासता, रानी पद्मावती के जौहर की। क्यों शोणित कुर्बानी दी, जो चित्तौड़ की महारानी थी।।१ राघव चेतन फनकार, करता था यंत्र-मंत्र। रंगे हाथों पकड़ा गया, राणा ने किया बहिष्कृत।।२ अपमानित राघव चेतन, अलाउद्दीन से जा मिला। रानी पद्मिनी के सौंदर्य का खिलजी से बखान किया।।३ आकर्षक व्यक्तित्व अलौकिक सौंदर्य, झील सी आंखे परियों सा रूप। अप्सराएं भी करती ईष्र्या, देवता भी हो जाएं मुग्ध।।४ सुन पद्मावती की सुंदरता, डोल गया अलाउद्दीन का मन। रानी पद्मिनी को अपना बनाने का, मन ही मन सुल्तान ने किया प्रण।।५ देख कमल सरोवर मे, रानी पद्मावती का अक्स। अधर्मी कर बैठा अधर्म, छल से राणा को लिया पकड़।।६ चित्तौड़ भिजवाया पैगाम, रानी को पहुंचाओ दिल्ली। रानी आ जाए मेरे हरम तक, बख्श दूंगा राणा की जिंदगी।।७ रानी पद्मा ने दिखाई दूरदर्शिता, कपटी सुल्तान को भेजा संदेश। मेरी शर्त सात सौ दासियों संग, रावल रतन सिंह से करुंगी भेंट।।८ चित्तौड़ सैनिक बैठे पालकी मे, स्त्री का सोलह श्रृंगार कर। छल का छल से दिया जवाब, रावल को कैद से छुड़ा कर।।९ अलाउद्दीन हुआ क्रोधित, छेड़ दिया भीषण जंग। मारे गए रावल रतन सिं...

कन्यादान एक महान दान

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शुरू हो गई नई कहानी, लाडली बेटी हो गई सयानी। दिन गए खेलने कूदने सोने के, अब छूट जाएंगे दिन बचपन के।। पिता ढूंढे नेक वर, द्वारे-द्वारे देता दस्तक। मां निहारे रस्ता दिन भर, आ गया कन्यादान का वक्त।। बेटी का करके कन्यादान, पिता ने रस्म निभाया महान। खुशियों के फूल बरसे हजार पिता के जीवन का आज दिन है खास।। पिता रोता देता यही दुआएं, बेटी खुश रहना न करना गम। सबका रखना ध्यान, तुम हो हमारा अभिमान।। बेटी क्यों हो जाती पराई, कन्यादान करने के बाद? बेटी है आंखो का तारा,फिर क्यों खत्म हो जाता बेटी का अधिकार? पिता करता है बलिदान, दान, लेने वाला हो जाता है कर्जदार। फिर भी गुरूर दिखाता है, अपमान के घूंट पिलाता है।। जिसने न कभी किया हो कन्यादान, वह क्या जाने नम आंखो की परिभाषा? तुम भी ऋणमुक्त, बन सकते हो महान गर दे दो पिता को मान,बेटी को सम्मान।। कन्यादान है एक महान दान, एक दूजे का करें सम्मान। बेटी का नही खत्म होता अधिकार, यह रस्म है एक जीवन का आधार।।

चकोर का संकल्प: चांद

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चांदनी रात चकोर के मन मे , प्रेम उल्लास जागा। चांद से मिलने की आस लिए, नभ में उड़ान भर प्रेम राग रागा।। पोर पोर का दर्द भुला बैठा, प्रेम मे पागल परवाना। हदय मे बसा चांद की मूरत, चांद छूने भागा दिवाना ।। चांद की आभा औ चांदनी रात, अपने सबाब पर था चांद। चकोर आ रहा है मिलने सोच, चांद भी पुलकित था आज।। चकोर थक कर चूर हो गया, हिम्मत हौसला जवाब दे रहा। पर्वत से टकरा जमी पर आ गिरा,सोचा  जीवन के साथ खत्म हो जाएगी अभिलाषा।। बेसुध जमी पर पड़ा चकोर, चांद भी रोए हालत देख चकोर। बोला!मत कर इतना प्रेम पगले, तेरी आशा न पूरी होगी बावले।। तू धरती पर रहने बाला, मै अंबर मे विचरने बाला। अधूरी रह जाएगी हसरत, कभी न होगा तेरा मेरा संगम।। चकोर मे हिम्मत जागी, अभी उर मे आस थी बाकी। चकोर का संकल्प था अटल, प्राण जाए,मिलना है मगर। उठ रही थी अग्निलपटे,  चकोर देख हर्षित हुआ। लपटों को चंद्रकिरणें समझ, अग्निस्फुलिगं चुग भस्म हुआ।। जीते जी न मिले तो क्या, मरने के बाद होगा मिलन। इसी उम्मीद में प्रेमी चकोर, मोहब्बत में हो गया कुर्बान ।। उदास चांद चकोर के , अंजाम पर आसूं बहा रहा। प्रकृति भी प्रेमी चकोर...

अग्निपथ

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उम्मीदों की नाव पर चल दिया, जो मुसाफिर तू होकर सवार। ना बिसरा देना अपनी सुध-बुध, ना गलत माझी को पकड़ाना पतवार।। यह जीवन है अग्निपथ, चलना होगा तुझे संभलकर। बहुत चेहरे मिलेगे पथ पर, निकालेंगे काम अपना बनकर।। ना तू कपटी-बेइमान, ना हदय में रखता मैल। पर श्रंगाल की खाल ओढ़े, घूमते यहां अनगिनत भेड़।। मुसाफिर हो जाएगी देर, जो तू ना चला संभलकर। तिनका-तिनका जोड़कर भी, ना सवार पाएगा अपना सफर।। प्रथम स्वयं को बना श्रेष्ठ, पूरे होंगे तेरे भी ध्येय। सवर जाएगे अनेक, जो तू बन गया सर्वश्रेष्ठ।।

क्या दोगे जवाब

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ओ परिंदे क्यों फसते हो? इन गिद्धो की चाल मे। बिछाते है जो शतरंजी मोहरे, लड़ जाते हो तुम बाज से।। दूर खड़े देख रहे सब तमाशा, उजड़ रहा सब कुछ तुम्हारा। उनका मकसद यही तो था, बाज परिंदे को बर्बाद करना।। समझो अब भी है समय, ना बनाओ अहं की लड़ाई। उन मासूमो का क्या होगा? बिना कसूर जान पर बन आई।। कहां करोगे तुम राज? बंजर विरान धरती पर। क्या दोगे जवाब जब? मासूम तुमसे करेंगे प्रश्न।। थोड़ा सा झुक जाओ, मिलजुलकर कर लो बात। सुलझाओ समस्या का हल, ना करो गिद्धों पर विश्वास।।

द्रवित चांद बोला

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अवनी की पीड़ा देखकर, द्रवित चांद बोला एकदिन। उर्वी को बना रहा आग का गोला, मनुज बहुत पछताएगा तू एकदिन।। नदियों को कर रहा प्रदुषित, वन उपवन को भी दे रहा काट। खेत खलिहान सब बेच रहा आज, क्या खाएगा-पिएगा तू एकदिन।। सीमेंट के महलों मे तू, सपने बुनता रात दिन। बता बिन परिंदों के कौन सा, साज बजाएगा तू एकदिन।। जो ना बची ये शस्य-श्यामला, तू भी ना बच पाएगा एकदिन। चांदनी रात का जो उठाता है लुत्फ, वो लुत्फ भी ना उठा पाएगा तू एकदिन।।