Posts

Showing posts from February, 2022

लघुकथा पूत-कपूत

Image
एक बार एक गांव मे भूकंप आया जिससे खेत के दो टुकड़े हो गए। कलेक्टर साहब अपनी टीम के साथ उस स्थान का मुआयना करने आए। अपनी टीम से बाते कर रहे थे कि "अरे खेत के तो दो टुकड़े हो गए"। कुछ ही दूरी पर बैठा एक बूढ़ा आदमी उनकी सब बाते सुन रहा था और बोला "जब पूत कपूत होइ जाई त माई क कलेजा न फाटे"।उस बूढ़े आदमी की बाते सुनकर कलेक्टर साहब तथा टीम के सभी सदस्यों की नजरें झुक गई।

नारी बहती नदियां-सी

Image
दो किनारों पर, नारी बहती नदियां-सी। दोनो किनारे होते, अनमोल बहुत-ही।। एक किनारा जनम देता, देता नव रूप आकार। प्यार दुलार से गढ़ता, करता हर सपना साकार। तपा-तपा कर सिखा-सिखा कर, बनाता खरा सोना। दूजे पल कहता बिटिया अब, तुझको दूजे घर का होना।। दूसरा किनारा अन्तिम पल तक, लेता है इम्तिहान। हर क्षण यही सिखाता, नारी का बस देना है काम। देते-देते करते करते, हो जाती जीर्ण-शीर्ण। अन्तिम समय आ जाता जब, कहते यही था तेरा नसीब। नारी मन गोते लगाता, दोनो किनारों के बीच। एक किनारे पर अंकूर फूटा, दूजे किनारे पर हो गई विलीन।।

चौका बर्तन

Image
क्यों रहुं मैं सीमित? सिर्फ चौका बर्तन तक। नही है छोटा मेरा दायरा, नही है छोटा मेरा व्यक्तित्व।1। कब मना किया मैंने? नही करुंगी मैं चौका बर्तन। कर सकती हूं बहुत कुछ, निपटा कर मैं चौका बर्तन।2। पहले मुझको समझो, थोड़ा मुझको समय दो। बदलो अपनी मानसिकता, नही है सब कुछ चौका बर्तन।3। चौका बर्तन !!चौका बर्तन, नही है यह सारा दिन का काम। क्यों घसीटते हो मुझको? सारा दिन ही करूं मैं काम।4। पढ़ी लिखी हूं काबिल हूं, बांट रखा है सभी को समय मे। कौन सा काम है कब करना? चौका बर्तन बोझ नही है मेरे लिए।5। मत फेरों पानी, मेरी उम्मीदों पर। आई हूं तुम्हारे घर, मैं भी कुछ सोच कर।6। ठीक है मत करो मेरी मदद, पर खुद की कर सकते हो मदद। ले लो खुद से एक गिलास पानी, जब थक के बैठी हूं करके चौका बर्तन।7। बनानी है मुझे भी अपनी पहचान, चमकाना है मुझे भी अपना वर्तमान। निभानी है घर परिवार की जिम्मेदारियां, अपने लिए करने दो मुझको भी तैयारियां।8।

चंचल मन

Image
चंचल मन मेरा कह रहा, जो मैं तितली बन जाऊं। डाली-डाली बाड़ी-बाड़ी, फिरू,यौवन पर इतराऊं। जो मैं भंवरा बन जाऊं, गुन-गुन मधुर गीत गाऊं। झूमे - मुस्काए कलियां, खेलें प्यारी अठखेलियां।। जो मैं झरना बन जाऊं, झर-झर गिरती जाऊं। नदियों संग मिलकर, कलकल संगीत सुनाऊं।। जो मैं कुसुम बन जाऊं, उपवन की सुंदरता बढ़ाऊं, रंग बिरंगे पुष्पो से मिल, चमन में सौरभ फैलाऊं।। जो मै हवा बन जाऊं, समर-भूमि में जाकर। वीरो के मस्तक चूमू, अपने भाग्य पर इठलाऊं।। जो मैं परिंदा बन जाऊं, पंख पसार उड़ जाऊं। उन्मुक्त गगन में उड़ने का सुख, क्या है धरा को बताऊं।।

पृथ्वीराज चौहान

Image
आज बसंत पंचमी है और आज के ही दिन पृथ्वीराज चौहान ने आत्मबलिदान दिया था। पढ़िए मेरी कविता पृथ्वीराज चौहान ...... पराक्रम साहस हथियार, दया करूणा  श्रंगार। परमवीर क्षमाशील क्षत्रिय, था पृथ्वीराज चौहान।। भास्कर-सा प्रखर प्रचंड, सिंह-सा करता गर्जन। तेज-तर्रार ओजस्वी भाषा, था अतुलनीय योद्धा।। तराइन का जीता युद्ध, पर चौहान कर बैठा भूल। गौरी ने मांगा क्षमा दान, राठोर ने बक्ष दी जान।। गौरी ने किया छल, सांकल से बांधा कर। सहस्त्र दी यंत्रणा, चौहान रचंमात्र ना घबराया।। आंखों में भरा ज्वार, निर्भिक निडर स्वाभिमान। प्राचीर में किया कैद, प्रतीत - सम गब्बर शेर।। गौरी को रास ना आया, गर्म छुरे से आंख दी फोड़। कर दिया जीवन में अंधेरा, जैसे बिन बाती के दीया।। उर में रह गई याद केवल, नेत्रों मे बसी जिसकी मूरत। थी प्रेम की प्रतिमूर्ति संयोगिता, दृग अब ना देख पाएंगी सूरत।। गजनी पहुंचा कवि चंदबरदाई, चौहान को देख हुआ निष्प्राण। जिसकी आभा थी मार्तण्ड समान, कैसे हो गया निस्तेज निष्प्राण? हे! कुलभूषण   रणधीर, चलाते तुम शब्दभेदी बाण। क्या तुमको नही तनिक भान? कैसा तू नादान ओ चौहान?  चं...