आज बसंत पंचमी है और आज के ही दिन पृथ्वीराज चौहान ने आत्मबलिदान दिया था। पढ़िए मेरी कविता पृथ्वीराज चौहान ...... पराक्रम साहस हथियार, दया करूणा श्रंगार। परमवीर क्षमाशील क्षत्रिय, था पृथ्वीराज चौहान।। भास्कर-सा प्रखर प्रचंड, सिंह-सा करता गर्जन। तेज-तर्रार ओजस्वी भाषा, था अतुलनीय योद्धा।। तराइन का जीता युद्ध, पर चौहान कर बैठा भूल। गौरी ने मांगा क्षमा दान, राठोर ने बक्ष दी जान।। गौरी ने किया छल, सांकल से बांधा कर। सहस्त्र दी यंत्रणा, चौहान रचंमात्र ना घबराया।। आंखों में भरा ज्वार, निर्भिक निडर स्वाभिमान। प्राचीर में किया कैद, प्रतीत - सम गब्बर शेर।। गौरी को रास ना आया, गर्म छुरे से आंख दी फोड़। कर दिया जीवन में अंधेरा, जैसे बिन बाती के दीया।। उर में रह गई याद केवल, नेत्रों मे बसी जिसकी मूरत। थी प्रेम की प्रतिमूर्ति संयोगिता, दृग अब ना देख पाएंगी सूरत।। गजनी पहुंचा कवि चंदबरदाई, चौहान को देख हुआ निष्प्राण। जिसकी आभा थी मार्तण्ड समान, कैसे हो गया निस्तेज निष्प्राण? हे! कुलभूषण रणधीर, चलाते तुम शब्दभेदी बाण। क्या तुमको नही तनिक भान? कैसा तू नादान ओ चौहान? चं...