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Showing posts from September, 2021

अनमोल रत्न

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हमारा शरीर सागर समान, जिसमे भरा अनमोल रत्न। बस जरूरत है एक बार, स्वयं करने की आत्ममंथन।। अच्छाई भी हमारे अंदर, बुराई भी हमारे अंदर। यह हमपर करता निर्भर , हम किसका करते मंथन।। अच्छाई से होता चहुमुखी विकास, बुराई से होता स्वयं का नाश। अच्छाई पर करें विचार, बुराई का करे परित्याग।। सकारात्मक सोच से मिलती ऊर्जा, नकरात्मक सोच से होता ऊर्जा का हास। सकारात्मकता से होता तन-मन का विकास, नकारात्मकता से होता समय और तन बर्बाद।। जो तन - मन रहे स्वस्थ, समझो यही अनमोल रत्न। और कोई रत्न ना काम आए, जब तन - मन रहे अस्वस्थ।।

चाह मेरी बस यही

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उठे जब भी कलम, मैं लिखती जाऊं, जग पढ़ता जाए, कलम कभी रूके नही, दुनिया कभी रूठे नही, चाह मेरी बस यही। कुछ ऐसा लिख जाऊं, जिससे जग जागे, अन्तर्मन जागे, ज्ञान का प्रकाश हो, अज्ञानता का नाश हो, चाह मेरी बस यही। रोते को हंसा दूं, सोते को जगा दूं, भटके को राह दिखा दूं, बिछड़े को गले मिला दूं, मैं रहूं या न रहूं, चाह मेरी बस यही। सच का आगाज करा दूं, धर्म की राह दिखा दूं, ईश्वर मे आस्था करा दूं, देश भक्ति का पाठ पढ़ा दूं, शिष्टाचार का भान करा दूं, चाह मेरी बस यही।

मां सबकी अच्छी होती

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मां चाहे जैसी भी हो, मां सबकी अच्छी होती है। प्रेम के सागर मे डूबी , कलकल बहती नदियां जैसी होती है।। नैनो से छलके अश्रु, पल मे सब समझ जाती है। आंचल में छुपा लेती, पिपल के छांव जैसी होती है।। अपनी इच्छाओं को मारती, हमारी इच्छाएं पूरी करती है। सदा देती रहती,ना कुछ लेती, धैर्यवान धरा जैसी होती है।। हमारा दर्द बांटती, अपना दर्द छुपा लेती है। विराट हदय वाली, नील गगन जैसी होती है।। गर मां न हो तो, सब कुछ वीरान लगता है। हवा सी सांसों में घुलती, प्रकृति का उपहार जैसी होती है।। मां से सब कुछ कह, मन हल्का कर लेते हैं। मां का मन सलोना, मां बिल्कुल मां जैसी होती है।।

भारत की विरासत हिंदी

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संस्कृत गर्भ से जन्मी है, सनातन पुरातन हिंदी भाषा। भारतम्बा भाल पर चमत्कृत, स्वाभिमानी गौरवमई मातृभाषा।। सोने की चिड़िया सम विख्यात, थी अपनी राष्ट्रभाषा। सूर तुलसी जायसी ने रची, इसमें असंख्य गाथा।। पावन भारत भूमि पर, हुआ अंग्रेजों का आगमन। अंग्रेजी हुकूमत ने किया, मातृभाषा का बेड़ा-गरग।। अंग्रेजी ने गड़ाए पांव, हिंदी का हो रहा पतन। कुछ साहित्य प्रेमियों ने, हिंदी बचाने की खाई कसम।। पतं का प्रकृति प्रेम, प्रेमचंद की कालजई कहानियां। दिनकर का ओज  क्रांति, भारतवासी के सिर चढ़कर बोला।। मीरा का स्फुट भक्ति रस, सुभद्रा की राष्ट्रीय चेतना। महादेवी आधुनिक मीरा, सब ने रची हिंदी रचना।। हिंदी सरल समृद्ध, भारत की विरासत। संस्कृति से परिपूर्ण, करती हिन्दुस्तान के हिफाजत।।

हिंदी का अलख जगाएं

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"वागेश्वरी मां कर जोड़ करूं वन्दन,दिजीए मुझको भाषा ज्ञान। समझ सकूं तुम्हारी वीणा से,निकले सुर लय और तान।।" विश्व गुरु के विश्व पटल पर, चमत्कृत अलंकृत हिंदी भाषा। रस छंद अलंकार जिसमे विद्ममान, सरल सरस सुमधुर हमारी मातृभाषा।। संस्कृत से उपजी संस्कारशील भाषा, सीखने आते अन्यत्र देश के शागिर्द। ऋषि मुनियों की यह पावन भूमि, जहां जन्मे श्री राम और कृष्ण।। मातृभूमि सम पवित्र मातृभाषा हिंदी, जिसमें लिखे असंख्य काव्य - ग्रंथ। वेदो की भाषा पुराणों की वाणी, जहा समझते समझाते मुनि-संत।। आओ हिन्दी को आत्मसात कर, जन-जन तक हिंदी का जगाएं अलख। बच्चा-बच्चा समझे बच्चा-बच्चा जाने, हिंदी का मर्म और हिंदी का गौरव।।

मात-पिता गुरूवर

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सर्वप्रथम मेरे कोंपल मन में, माता ने जगाया शिक्षा का अलख। सदाचार का पाठ पढ़ाकर, मेरे जीवन को किया उन्नत।। पिता ने हौंसला बढ़ाकर, वाह्य जगत का दिया ज्ञान। जग में कैसे जीना है? कराया इसका भान।। गुरूवर ने देकर विद्या-ज्ञान,  फैलाया जीवन में प्रकाश। सिखाया कैसे करें मन केन्द्रित? लक्ष्य पाना हो जाए आसान।। गुरु कृपा है एक उपहार, जो मिले गुरु आशीर्वाद। जीवन रूपी सागर खेना, हो जाए अत्यंत आसान।। मात-पिता गुरूवर सभी है, बालक के अनिवार्य शिक्षक। देकर बालक को उचित ज्ञान, सजाते - संवारते जीवन।। मात-पिता गुरूवर को, कर जोड़ करूं प्रणाम। कृपा दृष्टि आपकी बनी रहे, करें हम पर उपकार।।

बीता हुआ कल- आने वाला कल

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मां कष्ट सहकर, औलाद पैदा करती। जीवन का एक - एक पल, औलाद पर न्योछावर करती।। पिता रात दिन मेहनत करता, औलाद को काबिल बनाता। अपने सुदंर सपने त्याग कर, औलाद के सपने पूरा करता।। हदय मे बस एक ही आस, औलाद बनेगा बुढ़ापे का सहारा। जब शरीर से होगें लाचार, हाथ पकड़ कर देगा सहारा।। पर सब सपने जाते बिखर, जब औलाद हो जाता बेखबर। अपनी दुनिया में रहता मस्त, नही लेता मां - बाप की खबर।। आस टूटता विश्वास टूटता जैसे हाथ से रेत फिसलता। टूट गया सब स्वप्न - सजीला, जैसे टूटी मोतियों की माला।। अबंक में भरा,दर्द-भरा-नीर, उर में तकलीफो की तकलीफ़। फिर भी ना करते शिकायत, जी लेते जब तक यह जीवन।। मैं बीता हुआ कल,तू आने वाला कल, इस पल से तुझको भी गुजराना कल। आज समझ सकता है तो समझ, ना झेलना पड़े तुझको यह दर्द।। माता - पिता बनना सबका होता सपना, उनसे आस लगाते क्योंकि होता वह अपना। ज्यादा कुछ नही चाहते बस हाथों का सहारा, देना इज्जत,प्यार के दो मीठे बोल बोलना।।