अनमोल रत्न
हमारा शरीर सागर समान, जिसमे भरा अनमोल रत्न। बस जरूरत है एक बार, स्वयं करने की आत्ममंथन।। अच्छाई भी हमारे अंदर, बुराई भी हमारे अंदर। यह हमपर करता निर्भर , हम किसका करते मंथन।। अच्छाई से होता चहुमुखी विकास, बुराई से होता स्वयं का नाश। अच्छाई पर करें विचार, बुराई का करे परित्याग।। सकारात्मक सोच से मिलती ऊर्जा, नकरात्मक सोच से होता ऊर्जा का हास। सकारात्मकता से होता तन-मन का विकास, नकारात्मकता से होता समय और तन बर्बाद।। जो तन - मन रहे स्वस्थ, समझो यही अनमोल रत्न। और कोई रत्न ना काम आए, जब तन - मन रहे अस्वस्थ।।