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Showing posts from August, 2021

छीना आशियाना

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गौरैया जब तुम आती हो, मन हर्षित कर जाती हो। दाना चुगती पानी पीती, इधर उधर मंडराती हो।। कभी अमरूद की शाख पर, कभी फूलों की डाल पर। जब तुम सुस्ताती हो, घर खुशीयों से भर जाती हो।। पर अब कुछ उदास सी रहती हो जैसे कुछ कहना चाहती हो। तुम्हारे संगी साथी भी नही आते, तुम तनहा-तनहा सी दिखती हो।। शायद तपती धूप से बेहाल हो, ऊंची-ऊंची मिनारों से परेशान हो। सीमेंट के साम्राज्य ने छीन लिया, तुमसे तुम्हारा ही आशियाना।। अब न रहे कोटर,न दरख़्त, न सुनाई देता पक्षियों का कलरव। मरू हो गई यह धरा, जल का स्तर घट रहा, कहीं छिन न जाए? मानव तेरा भी आशियाना।।

सुषमा बिखेरती

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शरद ऋतु की अतुलित आभा, बिखेरती प्राकृतिक सुषमा। स्फटिक-आकाश तैरते हुए, उभरे बादल कपासनुमा।। बूंद - बूंद         बरसता, अचला की प्यास बुझाता। सोंधी - सोंधी   खुशबू से, मही का आंगन महकाता।। नभ से गिरती ओस की बूंद, पल्लव- पल्लव पर दमकती। जैसे तरू ने बिखराए हो, पात पर शबनम के मोती।। मंद-मंद चलती मधुर हवा, पत्र पर करती हलचल। तरू नीड़ में सोते परिंदे, नेत्र खोल करते कलरव।। झर - झर झरता झरना, कल - कल बहती आपगा। जल-क्रीड़ा करते मराल,  सुशोभित होता कल्हार।। कोयल कूकती शाख पर, तितलियां चूमती सुमन, डाली-डाली डोले भंवरा, चहुंओर  करें   गुंजन।। रंग-बिरंगे      सारंग, शोभा बढ़ाते उपवन। पंखुड़ी खोलता पंकज, प्रदीप्त होता सरोवर।। खग उड़ते उन्मुक्त गगन, लेकर     नव       उमंग। मालती  लिपटी तरूवर, नव      कोंपलों      संग।। कानन-कानन महकता, सौरभ फैलाता पुष्प। देख प्रकृति की अनुपम छटा, अतुलित मन होता खुश।।

बेटी का दर्द

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मैं बाबा की नन्ही गुड़िया, थी दुनिया से अनजान। हंसती खेलती मस्ती करती, मासूम कली थी नादान।। अभी तो सीख रही थी, ढंग से बोल बोलना। तुतला-तुतला कर बुलाती, अंकल ताऊ प्यारे भैया।। बेटी कहकर संग खेलता, हंसाता दुलारता प्यार करता। टाफी चाकलेट भी खिलाता, अपनापन खूब लुटाता।। अम्मा-बाबा खुश होते, कहते बन्दा है अच्छा इंसान। हमारी बेटी को मानता है, शायद वह भी थे अंजान।। जिसे मैं बुलाती थी, अंकल ताऊ प्यारे भैया। उसकी बुरी नजर थी मुझ पर, वह बहसी दरिन्दा निकला।। उस पापी कपटी अधर्मी ने, मासूमियत का कत्ल कर दिया नोचा मारा पीटा मुझको, इज्जत को तार-तार कर दीया।। मै रोती चिल्लाती रही, अम्मा-बाबा को बुलाती रही। उसको तनिक भी आई न दया, मेरे जीवन का अन्त कर दिया।। अम्मा-बाबा अब ना लाना, तुम मुझको धरती पर। कोख अपनी उजाड़ देना, स्वयं बचाना अपनी इज्जत।। मै अपना दर्द किससे कहूं, अम्मा-बाबा के दुख कैसे हरूं? कैसे मुझको न्याय मिलेगा, कैसे घर आंगन बचेंगी बेटियां? अम्मा मेरी विनती सुन लो, उस कपटी को फांसी दिलवाओ। या चौराहे पर लटकाकर, उसकी बोटी-बोटी कटवाओ।।

धृतराष्ट्र

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पुत्र मोह में फंसा, था ॴधर धृतराष्ट्र। भरतकुल किया कलंकित, चन्द्रवंश  का  सत्यानाश।। अपनी महत्वाकांक्षा को, नाम दिया दुर्योधन अड़। तथा अनुज भ्राता पांडु, पुत्रो को किया बेघर।। सब्र धीरज धैर्य का, मोल चुकाया पांडव ने। बारह वर्ष तथा एक साल, अज्ञातवास बिताया पांडव ने।। इंद्रप्रस्थ के बदले पांच गांव, मांगा वह भी ना दे सका। कहा जहां हो वहीं रहो, इसी मे है सबका भला।। पर नही था मंजूर, छोड़ना अपना हक। चाहे क्यों ना करना पड़े, अपनो से महायुद्ध।। एक तरफ पांडव सेना, दूसरी तरफ कौरव सेना। कौरव संग थे महारथी, पांडव संग सुदर्शनधारी।। अपनो को सामने देखकर, अर्जुन हुआ भाव-विभोर। कैसे शस्त्र उठाए अपनों पर? नारायण से करने लगा प्रश्न।। मन्द-मन्द मुस्काए कृष्ण, बोले पार्थ यह है धर्मयुद्ध। बताया जीवन-मरण का भेद, दिया गीता उपदेश।। जहां धर्म वहां मैं, जहां मैं वहां सत्य। जहां सत्य वहां विजय, निश्चित अधर्म पराजय।। हे कौन्तेय उठाओ गाण्डीव, करो धर्मयुद्ध। महाबली से महाबली, सेना से सेना लड़ी।। मुंड गिरे कट-कट, लाशें बिछी भूमि पर। मेदनी हुई लोहित, गिद्धों का था निमंत्रण।। अठारह दिन चला युद्ध, क...

नारी ने हार कहां मानी

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  नारी ने हार कहां मानी जब-जब विपदा पड़ी भारी, नारी ने हार कहां मानी। चंचल-चपल कुशाग्रबुद्धि,  सब्र धीरज धर भृकुटी तानी।। ना आंच आने दी परिवार पर, उठ खड़ी हुई बनी सहचर। जब - जब उठी गलत नजर, फोड़ी आंख बाज बनकर।। एक ही सपना नैनो ने पाला, जीना बस स्वाभिमान से जीना। कम से कम मे कर लेंगे गुजारा, पर ईमान ना कभी खोना।। हर हालात पर रखती पैनी नजर, ना घबराती आए कैसा भी तूफान। हिम्मत-हौसला भी रखती साथ, परिवार खातिर बन जाती भगवान।। हंसती-मुस्कुराती घर संभालती, बाहर भी खुद्दारी से करती काम। ना जाने कितनी पीढ़ियां संवारती, मात पिता का रोशन करती नाम। ©® प्रियंका त्रिपाठी 'पांडेय' प्रयागराज उत्तर प्रदेश ************************************** जब-जब विपदा पड़ी भारी, नारी ने हार कहां मानी। चंचल-चपल कुशाग्रबुद्धि, सब्र धीरज धर भृकुटी तानी।। ना आंच आने दी परिवार पर उठ खड़ी हुई बनी मेरूदण्ड। जब - जब उठी गलत नजर, फोड़ी आंख बाज बनकर।। एक ही सपना नैनो मे पाला, जीना बस स्वाभिमान से जीना। कम से कम मे कर लेंगे गुजारा, पर ईमान ना कभी अपना बेचना।। हर हालात पर रखती पैनी नजर, हिम्मत-...

धर्मयुद्ध

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  हे भारत के वीर सपूतों, उठो बढ़ाओ आगे कदम। करो एक बार फिर तुम,   धर्मयुद्ध ! धर्मयुद्ध ! धर्म कभी झूके नही, अधर्म कभी डटे नही। सत्य का प्रकाश हो, अन्धकार का नाश हो।। मातृभूमि के भाल पर, ना आने पाए कोई आंच। उनका सर कलम कर, मातृभूमि की ओर उठे जो आंख।। धधक उठी है चिंगारी, उर मे लगी जो आग। कर दो समूल नाश, जो देश को दीमक की तरह रहे चाट।। तुम हो भारत के प्रहरी, रख लो तिरंगे की लाज। अहि का करो पर्दाफाश, जो मातृभूमि को बेच रहे आज।। बांध लो सर पर कफ़न, कर दो अरि को दफन। उतार दो सब ऋण, जो समर-भूमि में दे गये प्राण।। सत्य का हो रहा मर्दन, धर्म का हो रहा खंडन। बन   जाओ   सुदर्शन, करो एक बार फिर तुम   धर्मयुद्ध ! धर्मयुद्ध !                                      

देशभक्त परिंदे

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उड़ चला नील गगन मे, एक पंछी का जोड़ा। लेकर तमन्ना सरहद पर, फहराऊ तिरंगा।। बाज-सा ले हौसला, उड़ रहे तुंग-गगन मे। तभी बादलों ने, आसमान को आ घेरा।। झम-झम बरसा पानी, दोनो भीग रहे थे। भीगे परिंदे, वृक्ष पर जा बैठे।। दोनो गुनगुना रहे, देशभक्ति तराने। करने लगे इन्तजार, रूकजाए बरसात।। तभी आहट-सी हुई, शिकारी ने साधा निशाना। उड़ चले सरहद की ओर, आंखों मे लेकर अंगारा।। उर मे लगा आकर शर, दोनो गिरे जमीं पर। सर-सर बह रहा रक्त, फिर भी दोनो थे मस्त।। अहेरी से बोले परिंदे, पूरी कर दो अन्तिम इच्छा। हां-हां ! बताओ क्या है? तुम्हारी अन्तिम इच्छा।। मरने से पहले हम, सरहद को चूमकर। चाहते हैं फहराना, आजादी का तिरंगा।। यह सुनते ही, आखेटक हुआ शर्मिन्दा। रोम-रोम उसका, आत्मग्लानि से भरगया।। झर-झर बह रहे अश्रु,लेकर पहुंचा समर-भूमि पर। चूमी सरहद की माटी होकर नतमस्तक।। तिरंगा फहराकर, प्राण दिया त्याग। व्याध बोला!हे देशभक्त परिंदे, मुझ अधम को कर दो माफ।। तिरंगे मे लिपटाकर, दोनो को किया प्रणाम। तुम्हे शत-शत नमन, तुम देश पर हो गए कुर्बान।।

सेनानी लड़कियां

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लड़कियों की सेना, उड़ चली गगन मे। देश पर मर-मिटने की, हमने खाई कसमें।। बांधकर सर पर कफ़न, निकले घर से हम। आंच ना आने देंगे, अपनी मातृभूमि पर हम।। अतल-वितल या हो तल, सब जगह हमारी निगाहें। गोलियों से देंगे भून गर, मातृभूमि की ओर उठी निगाहें।। आसमान के परिंदे, गर्जन से नही डरते। अपने पर आ जाएं, सिंह सा हूंकार भरते।। बाज सा लेकर हौसला, आसमान में हम उड़ते। अहि सामने आ जाए, पाताल उसको पहुंचाते।। हमारे बाजुओं मे दम, नही किसी से कम। हम सेनानी लड़कियां, आसमान हमारा घर।।

मित्र

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मित्र वही जो मुसीबत में, साथ दे हर बार। बाधाएं कितनी भी आए, मुंह न फेरे एक भी बार।। मित्र वही जो सच्चाई, का मार्ग दिखाए। यदि हम सुदामा हैं, तो स्वयं कृष्ण बन जाएं।। मित्र वही जो मित्र के लिए, हर पल मुस्कुराए। कितने भी शूल चुभे, कर्ण सा न्योछावर हो जाए।। मित्र वही जो अंधेरों में, उम्मीद की लौ जलाए। द्रौपदी की लाज बचाने, कृष्ण सा अन्तर्मन से दौड़ा आए।। मित्र वही है सच्चा जो, ख्वाबो को नई उड़ान दे। दुख के आंसू पोंछकर, हिम्मत हौसला बांध दे।। सबको ऐसा मित्र मिल जाए, जीवन खुशियों से भर जाए। कठिन से कठिन राह भी, सुगम सरल हो जाए।।