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Showing posts from May, 2021

कलयुग

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राम चन्द्र कह गए सिया से, ऐसा कलयुग आएगा। हंस चुगेगा दाना तिनका, कौआ मोती खाएगा।। शनै शनै समय पकड़ रहा, कलयुग की रफ्तार। देखो मानव पहुंच गया, धरती से आसमान ।। मानव जितना ऊपर उठा, उतना संस्कारो का हुआ हनन। धन वैभव की ख्याति बढ़ी , मर्यादा का हो रहा हरण।। नारी में अब ना सीता है, ना पुरूषों में अब राम है। नारी शील का हो रहा नाश, पुरूषों मे बढ़ रहा व्यभिचार।। लोभ-मोह काम-वासना, अधर्म असत्य चरम पर। मंदिर मस्जिद गुरूद्वारा, बना बहरूपिया का घर।। धीरज धैर्य सहनशीलता, बच्चों मे हो रहा कम। बात-बात पर मात-पिता की, अवहेलना करता हरदम।। अवनी का आंचल सूखा, धीरे-धीरे नीर हो रहा खतम। प्रकृति भी हमसे रूठी, परेशान हो रहा इंसा अब।। कलयुग के अन्तिम चरण मे, सबकुछ खत्म हो जाएगा। अगर बचेगा कुछ तो,भक्त-भगवान का सम्बन्ध बचा रह जाएगा।। राम चन्द्र कह गए सिया से, ऐसा कलयुग आएगा। हंस चुगेगा दाना तिनका, कौआ मोती खाएगा।। ©प्रियंका पांडेय त्रिपाठी प्रयागराज उत्तर प्रदेश

मां- जीवन का सार

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मां तुम हो सागर,मैं नदियां की धार। तुम बिन मेरा नही हो सकता उद्घार।। तुमने हंसना बोलना ,चलना सिखाया। धीरज धैर्य सच्चाई की राह दिखाया ।।  तुम प्रथम गुरु,नेकी का पाठ पढ़ाया। तुमने जीवन का हमें सार समझाया।। जब जब कदम लड़खड़ाए, तुमने उंगली थाम लिया। डांटा,प्यार से सही गलत का मतलब समझाया।। अपनी पीड़ा को छुपाया, मुस्कुराता चेहरा दिखाया।  अपनी इच्छाओं को मारा हम पर सब कुछ वार दिया।। हमारा भविष्य संवारा, जीवन को दिया एक किनारा। तुम्हारी वजह से कोई परिहास नहीं कर पाया हमारा।। मां तुम जीवन का सार, तुम बिन जीना है दुश्वार। तुम्हारा अहसास शीतल छाया तुम ही धरती आकाश।।

प्रार्थना

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हे प्रभु तू ले रहा, यह कैसा इम्तिहान? हर दिशा है विरान, इंसा हो रहा परेशान।। यह कैसा कहर ढा रहा? हर शख्स घबरा रहा। जान पर बन आई है, क्या कीमत लगाई है? माना हो गई बहुत, हमसे गलतियां। ऐशो आराम के लिए, उजाड़ी हमने बस्तियां।। धरा को किया छिन्न, प्रकृति से किया भिन्न। बंजर हो गई धरती,खतरे में जीवो का अस्तित्व।। तू है दाता, भाग्य विधाता। कर दे हमें माफ, समझ के अज्ञान।। हम है तेरे भक्त, हमे दे तू बक्ष। बचा ले जिन्दगी, यही हमारी बंदगी।।

कठपुतली

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कठपुतली मे जागी, विद्रोह की ज्वाला। धागे से बोली, मुझे आगे पीछे क्यों बांधा? बेड़ियों मे जकड़ी हूं,स्वतंत्र होना चाहती हूं। अपने पैरों पर खुद,खड़ी होना चाहती हूं।। खोल दो यह बंधन,कर दो मुझे आजाद। मैं स्वयं बनाऊंगी, अपना एक आधार।। धागा बोला बिन मेरे,नही कोई तेरी पहचान। गर मुझसे हो गई विलग,पड़ी रहोगी बेजान।। मै हूं बेबस,मेरी एक छोर तुमसे बंधी। दुजी छोर कलाकार की,उंगलियों में फंसी।। कलाकार स्वयं,कहानी कविता है गढ़ता। उसी अनुरूप मुझे,उंगलियों पर रगड़ता।। तुम थिरक थिरक कर, नाच दिखाती। कठपुतली नाम से, तुम जानी जाती।। उसने मेरा सहारा लेकर, तुम्हे बना दिया सजीव। अपनी कहानियों मे गढ़कर,कर दिया प्रसिद्ध।। मेरा और कलाकार का, नही होता है नाम। सभी लोग लेते है ,बस कठपुतली का नाम।। कठपुतली की समझ मे आ गई,धागे की सब बात। उसे हुआ एहसास,धागे के संग है मेरा सच्चा साथ।।  

स्वातीभक्त:पपीहा

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वर्षा ऋतु का मौसम उस पर, पी-कहां पी-कहां का मधुर स्वर। ऊंची डाल पर बैठा पपीहा, स्वाती बूंद की बाट जोह रहा।।१।। सुन पपीहे का विरह राग, मन व्यथित हुआ ऋतुराज। समझाने का लिया संकल्प,कहीं पपीहे का निकल न जाए प्राण?२।।   सुन पपीहे यह कैसी हठ है? चहुं ओर पानी ही पानी। फिर क्यों तू प्यासा रह जाता? यह कैसी तेरी मनमानी?३।। कितनी नदियां ताल तलैया, झरना भी झर झर है बहता। फिर क्यों सालों से है प्यासा? तूने तो निराजली व्रत कर डाला।।४।। पानी पानी में भेद क्यों करता? क्यों स्वाती बूंद की जिद करता? पानी पी कर प्यास बुझा ले, पहले तू अपनी जान बचा ले।।५।। तुम क्या जानो प्रेम की भाषा? प्रेम समर्पण है प्रेम अनुराग है। प्रेम मे जीना मरना है पड़ता, प्रेम पर सब कुछ कुर्बान है।।६।। मै तो स्वाती बूंद का प्यासा, स्वाती बूंद से है प्यास बुझाना। मुझको और न कोई अभिलाषा, स्वाती बूंद है मेरी जिज्ञासा।।७।। युगों-युगों तक करूंगा इन्तजार, भले ही निकल जाए मेरे प्राण। मैं हूं स्वाती बूंद का परवाना, और कुछ भी न चाहे दिवाना।।८।। ऋतुराज रह गए हतप्रभ, सुन प्रेम की पराकाष्ठा। कहा!तू है स्वाती भक्त, पूरी होगी तेर...

कस्तूरी मृग

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अप्रतिम सौंदर्य सुरम्य नयन, घूम रहा मनमोहक मृग। आलोकित करता वन उपवन कितना रमणीक है दृश्य।। सहसा हवा का झोंका आया, मन तेरा क्यों भरमाया? कैसी खुशबू है फैली? मन तेरा हो गया बावरा।। शाकाहारी है तेरा जीवन, फूल पत्ती का करता सेवन। मन तेरा अति निर्मल, क्या ढूंढ रहा जंगल जंगल? लंबी लंबी सरपट दौड़ लगाए, फिर क्यों तू संशय मे आए? रूक-रूक मुड़-मुड़ देखे, काल को स्वयं पास बुलाए।। अहेरी था घात लगाए, प्राण तेरे संकट में आए। जो तू खुद को समझ जाता, यूं न अपने प्राण गंवाता।। तू कितना नादान कस्तूरी, खुद से ही था अनजान। झांक लेता मन के अंदर, केर लेता अपनी पहचान।। जिस खुशबू वन-वन भटका, वह थी तेरे पास। खुद से खुद को जान जाता, न रहता मन बेकरार।।

बूंद- नदी- समंदर

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नदी पहुंची समंदर के पास, बोली आ गई मै तुम्हारे द्वार। अनवरत चलते-चलते गई थक, समा लो मुझको अपने अंदर।। सागर को हुआ अभिमान, बोला!मेरे आगे तेरी क्या बिसात? तू छोटी सी नदी,मैं विशाल समंदर, क्यों समा लू तुझे अपने अंदर? मैले कुचैले रस्तों पर चलकर, लाई अनगिनत गंदगी भरकर। मै करता एक जगह निवास, गंदगी नही  मेरे आस-पास।। तू जा पोखर के पास, वहीं बना अपना निवास। नदी पोखर एक समान, मेरा है वृहद आकार।। नदी हो गई उदास, पहुंची बूंद के पास। सुनाई अपनी व्यथा, बूंद हो गया खफा।। बोला मत हो उदास, करता हूं सागर से बात। बूंद समुद्र से बोला, मै नदी से भी छोटा।। क्या है तुम्हारा कहना? गर बंद कर दूं बरसना। सूख कर हो जाओगे छोटे, क्यों बनते हो अक्ल के अंधे? क्या तुम्हें नही पता? बूंद बूंद से सागर भरता, बूंद बूंद से भरता गागर। मुझसे ही नदियां बनती, नदियों से बनता सागर।। अपनी श्रेष्ठता पर, ना करो तुम गुमान। छोटे बड़े मे ना भेद करो, सबका है खास स्थान।।