Posts

Showing posts from December, 2020

ध्रुवतारा बन जाएंगे

Image
पुराना सब कुछ भुलाकर, नए साल मे कुछ ऐसा कर जाएंगे। सपनो के पंख लगाकर, आशाओं के फूल खिलाएंगे।। हिम्मत की मशाल लेकर, नदियों सा अविरल बहते जाएंगे। हिमालय सा सीधा तनकर, स्वाभिमान का अलख जगाएंगे।। लक्ष्यभेदना ही लक्ष्य हमारा, मंजिल को कदमो में झुकाएंगे। कारवां चले संग हमारे, नया साल हम ऐसा बनाएंगे।। सही पथ पर चलकर, भविष्य को उज्जवल बनाएंगे। अनुशासन मे रहकर, जीवन को सफल बनाएंगे।। लेकर मन मे उमंग तरंग, खुशियों की रश्मियां बिखेर जाएंगे। मां बाप के सपने पूरे कर, उनका ध्रुवतारा बन जाएंगे।‌।

नन्ही कली

Image
नन्ही कली की तमन्ना है मैं भी फूलो की तरह खिलू चारो तरफ खुशबू फैलाऊं रंग बिरंगी तितलियों की तरह इठलाऊं इतराऊ फूलो के रंगों चुराऊ कोयल की तरह मधुर राग सुनाऊं मोरनी की तरह पखं फैलाकर झूम झूम नाचूं आसमान मे इन्द्रधनुषिय रंगों की छटा बिखेरू सारा समा हो जाए सुहाना मुझे मत तोड़ो मुझे खिलने दो मुझे जन्म लेने दो

मै शून्य हूं

Image
आज गणित दिवस है तथा महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन जी का जन्मदिन है इसी उपलक्ष्य में मेरी कविता पढ़िए..... हां स्वीकार है मुझे मैं शून्य हूं पूरा ब्रह्माण्ड मुझमें समाया विधाता की मैं जननी हूं दुख भी मैं,सुख भी मैं तुच्छ हूं पर महत्वपूर्ण हूं  मै शून्य हूं आगे लग जाऊं तो मान बढ़ा दू गुणा कर दो तो अदृश्य कर दूं अमूल्य हूं पर बहुमूल्य हूं मैं शून्य हूं गणना में इकाई, दहाई,सैकड़ा हूं मेरे बिना असम्भव है कोई अनुमान लगाना सूरज से चांद तक की दूरी का गुमान हूं तिरस्कृत हूं पर गम्भीर हूं हां स्वीकार है मुझे मैं शून्य हूं                                  

मनमोहिनी

Image
मन को छू ले ऐसी है काया। ऐसे ही फलती रहे देती है छाया।। तुझे बार बार मै देखूं। मन ही मन पुलकित हो जाऊं।। तु जूही चम्पा चमेली। झूमे अमवा की डाली।। नदियां बरखा तेरी सहेली। हवाओं संग खेले अठखेलि।। तु जीवन दान देती। सुधा रस बरसाती।। हे मनमोहिनी तुझे! कभी कलम से पिरोऊ। कभी चित्रो से सवारू। ऐसे ही फलती रहे देती है छाया।।             

लेख - बच्चो की सहजता छीन ली

Image
बचपन'स्मृति पटल पर आते ही मन भाव विभोर हो उठता है।बचपन कितना आनन्ददायक होता था। लड़के गेंद से तो कभी गुल्ली डंडे से खेलते थे वहीं लडकियां गुड़िया गुड्डो से खेलना पसंद करती थी।आइस पाइस बच्चो का मन पसंद खेल होता था।             सूर्यास्त होते ही बच्चे दादा दादी नाना नानी के पास जाकर कहानियां सुनते तथा प्रेरणा लेते थे।खुले आसमान मे सोते थे पहेलियां पूछते थे जिससे दिमागी कसरत होती थी। बिना उपकरण के खेल खिलौने जैसे रस्सी कूद, कबड्डी,खो खो, पकड़म पकड़ी आदि शारीरिक मानसिक रूप से दक्ष बनाते थे।घर के कामो मे सहयोग करते थे।             बच्चो का बचपन कितना सरल तथा सहज होता था। किसी भी तरह से बनावटीपन नही था। सभ्यता संस्कार से परिपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। बच्चो का काम खेलना-कूदना,कहानियां सुनना,खाना,सोना, शरारतें करना इत्यादि। पड़ोसी के बच्चो के साथ मिलकर धमाचौकड़ी करते।बच्चे स्वयं अपने हाथों से मिट्टी के खिलौने बनाते थे जैसे चकला बेलन, चूल्हा, पहिया, बैलगाड़ी, तांगा इत्यादि और मस्त रहते थे। साइकिल का टायर, लोहे की रिगं मिल जा...

क्या लिखूं

Image
सोचती हूं क्या लिखूं लिख दूं रोज की पाती या दर्द भरी कोई कहानी सोचती हूं क्या लिखूं । जीवन एक फसाना है आना और जाना है संघर्ष करते हुए हंसते हंसते जीवन बिताना है । सोचती हूं क्या लिखूं लिख दूं रोज की पाती । आदमी का जीवन तो यादों का पिटारा है पिटारे को खोलो तो सुख दुख हमारा है । सोचती हूं क्या लिखूं लिख दूं रोज की पाती । ज़िन्दगी का मोल समझो तो जीवन से प्यार हो जाएगा कितने भी आंधी तूफान आये सागर को किनारा मिल जाएगा । सोचती हूं क्या लिखूं लिख दूं रोज की पाती ।

प्रेम पथिक

Image
   चाह मेरी मैं राधा बन जाऊं वंशी की धुन पर दौड़ी आऊं गोपियों संग नाचूं थिरकू कान्हा की मुरली बन जाऊं मैं प्रेम पथिक कहलाऊं!!! चाह मेरी मैं मीरा बन जाऊं नित नए भजन मैं गांऊ कृष्ण की भक्ति में खो जाऊं गिरधर की दीवानी बन जाऊं मैं प्रेम पथिक कहलाऊं!!! चाह मेरी मै कली से फूल बन जाऊं फूलो की माला बन गूंथी जाऊं वीरो के गले का हार बन जाऊं अपने भाग्य पर इतराऊं इठलाऊं मैं प्रेम पथिक कहलाऊं!!!