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Showing posts from July, 2021

सावन की घटा

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छाई सावन की घनघोर घटा, धरणी ने धानी आवरण धरा। श्यामल घटा   दिनकर छिपा, सर-सर चली शीतल हवा‌।। विरहिन का इंतजार खतम हुआ, पीहु-पीहु पपीहा मधुर बोल रहा। कुहू-कुहू बोल लाजवंती रही लजा, दादुर टर्र-टर्र शोर मचा रहा।। तरू-पल्लव खुशी से झूम उठे, डाली-डाली कुसुम मुस्का रहे। सरिता ने फैलाया आंचल अपना, जोर-जोर से बरसी सावन की घटा।। घुमड़ - घुमड़ के गरजे बदरा, छमक - छमक के बरसे बरखा। पर्वतों ने वृष्टि का आलिंगन किया, वसुंधरा ने बरखा का रसपान किया।। छाई हरियाली,प्रकृति का अंग-अंग खिला, मनमोहक - सुगंधित वातावरण हुआ। भर गए ताल-तड़ाग,हंस-हंसावर करें क्रीड़ा, मिलिंद गुनगुनाए,पंख फैला ध्वजी झूमा।। कलियां खिली डाली-डाली झूमीं, पवन संग खेले आंख मिचौली। धरणी से नेह लगाए नील-गगन, झम-झम बरसे सावन की घटा।।

गुरु ज्ञान का सागर

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गुरु पूर्णिमा पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 🙏🏻🙏🏻💐💐 नही मिलता गुरु बिन ज्ञान, गुरु फैलाता ज्ञान का प्रकाश। बच्चों का मन कच्ची माटी समान, कुम्हार बन गुरू देता नया आकार।। जैसे बिन दीपक मन्दिर सूना, वैसे बिन गुरु जीवन में अंधेरा। जैसे बिन चाक श्यामपट्ट काला, वैसे बिन गुरु जीवन मे निराशा।। पंख फैलाकर उड़ना सिखाता, नभ को चूमकर जमीं पर आना। और सिखाता विनम्रता का पाठ, मन में ना लाना कभी अभिमान।। बड़ों की सेवा ,करो सत्कार, तभी होगा जीवन का उद्धार। सत्य अहिंसा पथ पर चलकर, बनाओ अपना जीवन महान।। गुरु ज्ञान का सागर, भर देता ज्ञान का गागर। गुरु का करो सम्मान, गुरु से मिलती पहचान।।

मौन रहकर आगे बढ़ना सीखा

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मैंने मौन रहकर कदम बढ़ाना सीखा। मैंने नदी की धार सा निरंतर बढ़ना सीखा।। मैंने तिनका तिनका जोड़कर अरमानों को सीना सीखा। मैंने पग पग पर उम्मीद का दीया जलाना सीखा।। मैंने पखं पसारकर आसमान मे उड़ना सीखा। मैंने सपनो मे रंग भरने का हौसला सीखा।। मैंने गिरकर उठना उठकर संभलना संभलकर चलना सीखा। मैंने चट्टान बनकर मुसीबतों से टकराना सीखा।। मैंने कांटों मे भी खुशबू फैलाना सीखा। मैंने हंसते हंसते जख्मों को भरना सीखा।। मैंने मन की गहराई से जिंदगी का सबक सीखा। मैंने तिमिर में भी रश्मियां फैलाना सीखा।। मैंने मौन रहकर कदम बढ़ाना सीखा। मैंने मौन रहकर आगे बढ़ना सीखा।।

यम-विजयिनी: सती सावित्री

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अटल अनुष्ठान सिद्धि उपरांत, सतयुग  में   जन्मी। दृढ़   संकल्पी   विदुषी, असाधारण कन्या सावित्री।।१ अद्वितीय सौंदर्य ओज, विलक्षण-प्रतिभा वैदुष्य। वेद-वेदांग शास्त्र में निपुण, सावित्री   थी   धर्मज्ञ।।२ तरूणाई आई आगया, समय   स्वयंवर   का। सावित्री ने सत्यवान को, मन ही मन पति चुना।।३ कामदेव-सम    सुंदर, बलिष्ठ पराक्रमी साहसी। सत्यवादी उदार धैर्यवान, परन्तु अल्पायु था सत्यवान।।४ माता नेत्रहीन-पिता संग, सत्यवान रहता वन। राज्य छिन जाने से, आश्रम में करते तप।।५ शुभ मुहूर्त में सावित्री का, विवाह हुआ सत्यवान संग। सास-ससुर पति की सेवा करती, नियम पूर्वक करती उपवास व्रत।।६ सत्यवान की आयु के, मात्र चार दिन शेष बचे। सावित्री ने त्याग दिया अन्न-जल, कठोर व्रत-साधना मे गई लग।।७ अरण्य की ओर चल पड़ा, लकड़ी काटने सत्यवान। सावित्री  भी  संग  गई, मृत्यु का अन्तिम दिन आज।।८ कराहने लगा सत्यवान, काष्ठ  काटते  वक्त। देह में हो रही पीड़ा, लेट गया  भू पर।।९ सावित्री ने सत्यवान का, शीश अं...

खुद से मुलाकात हुई

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एक दिन मेरी हुई, खुद से मुलाकात। मेरा अन्तर्मन बोला, क्यों तू है परेशान? ज़िन्दगी के रास्ते, नही होते हैं आसान। इसमे फूल कम, कांटे होते हैं ज्यादा।। कांटो पर चलकर, जो संयम बरतते। वही एक दिन, फूल सा है खिलते।। हिम्मत हौसला संग, लेकर है चलते। कितनी  भी आए बाधाएं , विचलित नही होते।। ईर्ष्या द्वेष से दूर रहकर, मंजिल को है तराशते। सत्य मधुर वाणी से , सबका मन जीत लेते।। सागर की लहरों सा, शांत हो गया मेरा मन। जैसे सागर मे आया, कोई तूफान गया हो छट।। खुद से खुद को जाना, अन्तर्मन से स्वयं को पहचाना। जिंदगी का सफर हो गया आसान, मंजिल में नही अब कोई व्यवधान।।

सुंदरता का कोई मोल नही

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सुंदरता का कोई मोल नही,जब तक मीठे बोल नही। दो पल की कश्ती है, कब टूटे सांसों की डोर यहीं।। वह हदय नही पत्थर है, जिसमे करूणा सम्मान नही। फिर रूप और रंग पर , क्यों तू अभिमान है करती।। परिश्रम से हर सपना पूरा हो, इर्ष्या घृणा से मिलता प्यार नही। छल कपट से सपने पूरे हो, क्यों तू ऐसे अरमान संजोती।। मेहनत से हो मानव उद्धार,आलस से होता कोई काम नही। कर्मो से होती है पहचान,मानस जीवन की यही कहानी।। सुंदरता का कोई मोल नही,जब तक मीठे बोल नही। दो पल की कश्ती है, कब टूटे सांसों की डोर यहीं।।