इम्तहान



रेत के महल अक्सर,
लहरों संग बह ही जाते है।
उम्मीदे टूट कर बिखर गई तो क्या?
अभी हौसलों की उड़ान बाकी है।।

कांच के सपने अक्सर,
टूट ही जाया करते हैं।
एक सपना टूट गया तो क्या?
अभी नया सपना देखना बाकी है।।

मंजिल की चाह मे अक्सर,
सबकुछ भूलना पड़ता हैं।
तुमको नही जानता कोई तो क्या?
अभी खुद से खुद की पहचान बाकी है।।

भीड़ में चलने वाले अक्सर,
भीड़ में ही खो जाते हैं।
अकेला चलना पड़ा तो क्या?
अभी असली पहचान बनाना बाकी है।।

एक ढर्रे पर चलने वाले अक्सर,
एक दायरे मे सिमट जाते हैं।
तूफानी राहों पर चलना पड़ा तो क्या?
अभी जिन्दगी के कई इम्तहान बाकी है।।


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