क्या लिखूं



सोचती हूं क्या लिखूं
लिख दूं रोज की पाती
या दर्द भरी कोई कहानी
सोचती हूं क्या लिखूं ।

जीवन एक फसाना है
आना और जाना है
संघर्ष करते हुए
हंसते हंसते जीवन बिताना है ।

सोचती हूं क्या लिखूं
लिख दूं रोज की पाती ।

आदमी का जीवन तो
यादों का पिटारा है
पिटारे को खोलो तो
सुख दुख हमारा है ।

सोचती हूं क्या लिखूं
लिख दूं रोज की पाती ।

ज़िन्दगी का मोल समझो तो
जीवन से प्यार हो जाएगा
कितने भी आंधी तूफान आये
सागर को किनारा मिल जाएगा ।

सोचती हूं क्या लिखूं
लिख दूं रोज की पाती ।


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