चांदनी रात चकोर के मन मे , प्रेम उल्लास जागा। चांद से मिलने की आस लिए, नभ में उड़ान भर प्रेम राग रागा।। पोर पोर का दर्द भुला बैठा, प्रेम मे पागल परवाना। हदय मे बसा चांद की मूरत, चांद छूने भागा दिवाना ।। चांद की आभा औ चांदनी रात, अपने सबाब पर था चांद। चकोर आ रहा है मिलने सोच, चांद भी पुलकित था आज।। चकोर थक कर चूर हो गया, हिम्मत हौसला जवाब दे रहा। पर्वत से टकरा जमी पर आ गिरा,सोचा जीवन के साथ खत्म हो जाएगी अभिलाषा।। बेसुध जमी पर पड़ा चकोर, चांद भी रोए हालत देख चकोर। बोला!मत कर इतना प्रेम पगले, तेरी आशा न पूरी होगी बावले।। तू धरती पर रहने बाला, मै अंबर मे विचरने बाला। अधूरी रह जाएगी हसरत, कभी न होगा तेरा मेरा संगम।। चकोर मे हिम्मत जागी, अभी उर मे आस थी बाकी। चकोर का संकल्प था अटल, प्राण जाए,मिलना है मगर। उठ रही थी अग्निलपटे, चकोर देख हर्षित हुआ। लपटों को चंद्रकिरणें समझ, अग्निस्फुलिगं चुग भस्म हुआ।। जीते जी न मिले तो क्या, मरने के बाद होगा मिलन। इसी उम्मीद में प्रेमी चकोर, मोहब्बत में हो गया कुर्बान ।। उदास चांद चकोर के , अंजाम पर आसूं बहा रहा। प्रकृति भी प्रेमी चकोर...
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