मृगतृष्णा



कितना मनोरम दृश्य?
देखा मैंने सुंदर मृग।
रूचिर नयन रमणीक अंग,
आलोकित करता है मन।।१।।

इत उत घूम रहा,
जाने क्या ढूंढ रहा?
दिख रहा बावला सम,
क्यों बेचैन तेरा मन?।।२।।

गर्मी की चिलचिलाती धूप,
पड़ता जब सूर्य प्रकाश।
चमकता है रेगिस्तानी रेत,
जल का होता है आभास।।३।।

प्यास से व्याकुल मृग,
आभास मात्र यथार्थ समझ।
उसके पीछे भागता रहा,
प्यास बुझ जाए आज शायद।।४।।

धूल धूसरित लड़खड़ाता,
बेसुध हो दौड़ लगाता।
बरसात होगी तपती रेत पर,
सिसकती रेत से आस लगाता।।५।।

मंजिल तक पहुंच जाएगा,
जल पीकर प्यास बुझाएगा।
सारा जीवन इसी भ्रम में,
काट रहा है मृग अपना।।६।।

समझ जा नादान मृग,
यह है आंखों का भ्रम।
नही है कहीं भी जल,
क्यों न समझे तेरा मन?।।७।।

मृगतृष्णा नही होती पूरी,
झांक ले अन्तर्मन।
समझ जाए बात अगर,
शांत हो जाए तेरा मन।।८।।


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