बूंद- नदी- समंदर
नदी पहुंची समंदर के पास,
बोली आ गई मै तुम्हारे द्वार।
अनवरत चलते-चलते गई थक,
समा लो मुझको अपने अंदर।।
सागर को हुआ अभिमान,
बोला!मेरे आगे तेरी क्या बिसात?
तू छोटी सी नदी,मैं विशाल समंदर,
क्यों समा लू तुझे अपने अंदर?
मैले कुचैले रस्तों पर चलकर,
लाई अनगिनत गंदगी भरकर।
मै करता एक जगह निवास,
गंदगी नही मेरे आस-पास।।
तू जा पोखर के पास,
वहीं बना अपना निवास।
नदी पोखर एक समान,
मेरा है वृहद आकार।।
नदी हो गई उदास,
पहुंची बूंद के पास।
सुनाई अपनी व्यथा,
बूंद हो गया खफा।।
बोला मत हो उदास,
करता हूं सागर से बात।
बूंद समुद्र से बोला,
मै नदी से भी छोटा।।
क्या है तुम्हारा कहना?
गर बंद कर दूं बरसना।
सूख कर हो जाओगे छोटे,
क्यों बनते हो अक्ल के अंधे?
क्या तुम्हें नही पता?
बूंद बूंद से सागर भरता,
बूंद बूंद से भरता गागर।
मुझसे ही नदियां बनती,
नदियों से बनता सागर।।
अपनी श्रेष्ठता पर,
ना करो तुम गुमान।
छोटे बड़े मे ना भेद करो,
सबका है खास स्थान।।
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