कस्तूरी मृग
अप्रतिम सौंदर्य सुरम्य नयन,
घूम रहा मनमोहक मृग।
आलोकित करता वन उपवन
कितना रमणीक है दृश्य।।
सहसा हवा का झोंका आया,
मन तेरा क्यों भरमाया?
कैसी खुशबू है फैली?
मन तेरा हो गया बावरा।।
शाकाहारी है तेरा जीवन,
फूल पत्ती का करता सेवन।
मन तेरा अति निर्मल,
क्या ढूंढ रहा जंगल जंगल?
लंबी लंबी सरपट दौड़ लगाए,
फिर क्यों तू संशय मे आए?
रूक-रूक मुड़-मुड़ देखे,
काल को स्वयं पास बुलाए।।
अहेरी था घात लगाए,
प्राण तेरे संकट में आए।
जो तू खुद को समझ जाता,
यूं न अपने प्राण गंवाता।।
तू कितना नादान कस्तूरी,
खुद से ही था अनजान।
झांक लेता मन के अंदर,
केर लेता अपनी पहचान।।
जिस खुशबू वन-वन भटका,
वह थी तेरे पास।
खुद से खुद को जान जाता,
न रहता मन बेकरार।।
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