स्वातीभक्त:पपीहा
वर्षा ऋतु का मौसम उस पर,
पी-कहां पी-कहां का मधुर स्वर।
ऊंची डाल पर बैठा पपीहा,
स्वाती बूंद की बाट जोह रहा।।१।।
सुन पपीहे का विरह राग,
मन व्यथित हुआ ऋतुराज।
समझाने का लिया संकल्प,कहीं
पपीहे का निकल न जाए प्राण?२।।
सुन पपीहे यह कैसी हठ है?
चहुं ओर पानी ही पानी।
फिर क्यों तू प्यासा रह जाता?
यह कैसी तेरी मनमानी?३।।
कितनी नदियां ताल तलैया,
झरना भी झर झर है बहता।
फिर क्यों सालों से है प्यासा?
तूने तो निराजली व्रत कर डाला।।४।।
पानी पानी में भेद क्यों करता?
क्यों स्वाती बूंद की जिद करता?
पानी पी कर प्यास बुझा ले,
पहले तू अपनी जान बचा ले।।५।।
तुम क्या जानो प्रेम की भाषा?
प्रेम समर्पण है प्रेम अनुराग है।
प्रेम मे जीना मरना है पड़ता,
प्रेम पर सब कुछ कुर्बान है।।६।।
मै तो स्वाती बूंद का प्यासा,
स्वाती बूंद से है प्यास बुझाना।
मुझको और न कोई अभिलाषा,
स्वाती बूंद है मेरी जिज्ञासा।।७।।
युगों-युगों तक करूंगा इन्तजार,
भले ही निकल जाए मेरे प्राण।
मैं हूं स्वाती बूंद का परवाना,
और कुछ भी न चाहे दिवाना।।८।।
ऋतुराज रह गए हतप्रभ,
सुन प्रेम की पराकाष्ठा।
कहा!तू है स्वाती भक्त,
पूरी होगी तेरी अभिलाषा।।९।।
घिर घिर आए कारे बदरा,
स्वाती बूंद का जल जो बरसा।
पपीहे के कंठ मे जा समाया,
स्वाती बूंद पी कर प्यास बुझाया।।१०।।
तू धन्य है ओ पपीहे,
अद्भुत है तेरी स्वाती भक्ति।
पक्षी होकर प्रेम का मर्म समझाया,
और समझाया प्रेम मे है शक्ति।।११।।
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