कलयुग
राम चन्द्र कह गए सिया से,
ऐसा कलयुग आएगा।
हंस चुगेगा दाना तिनका,
कौआ मोती खाएगा।।
शनै शनै समय पकड़ रहा,
कलयुग की रफ्तार।
देखो मानव पहुंच गया,
धरती से आसमान ।।
मानव जितना ऊपर उठा,
उतना संस्कारो का हुआ हनन।
धन वैभव की ख्याति बढ़ी ,
मर्यादा का हो रहा हरण।।
नारी में अब ना सीता है,
ना पुरूषों में अब राम है।
नारी शील का हो रहा नाश,
पुरूषों मे बढ़ रहा व्यभिचार।।
लोभ-मोह काम-वासना,
अधर्म असत्य चरम पर।
मंदिर मस्जिद गुरूद्वारा,
बना बहरूपिया का घर।।
धीरज धैर्य सहनशीलता,
बच्चों मे हो रहा कम।
बात-बात पर मात-पिता की,
अवहेलना करता हरदम।।
अवनी का आंचल सूखा,
धीरे-धीरे नीर हो रहा खतम।
प्रकृति भी हमसे रूठी,
परेशान हो रहा इंसा अब।।
कलयुग के अन्तिम चरण मे,
सबकुछ खत्म हो जाएगा।
अगर बचेगा कुछ तो,भक्त-भगवान
का सम्बन्ध बचा रह जाएगा।।
राम चन्द्र कह गए सिया से,
ऐसा कलयुग आएगा।
हंस चुगेगा दाना तिनका,
कौआ मोती खाएगा।।
©प्रियंका पांडेय त्रिपाठी
प्रयागराज उत्तर प्रदेश
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