कठपुतली
कठपुतली मे जागी, विद्रोह की ज्वाला।
धागे से बोली, मुझे आगे पीछे क्यों बांधा?
बेड़ियों मे जकड़ी हूं,स्वतंत्र होना चाहती हूं।
अपने पैरों पर खुद,खड़ी होना चाहती हूं।।
खोल दो यह बंधन,कर दो मुझे आजाद।
मैं स्वयं बनाऊंगी, अपना एक आधार।।
धागा बोला बिन मेरे,नही कोई तेरी पहचान।
गर मुझसे हो गई विलग,पड़ी रहोगी बेजान।।
मै हूं बेबस,मेरी एक छोर तुमसे बंधी।
दुजी छोर कलाकार की,उंगलियों में फंसी।।
कलाकार स्वयं,कहानी कविता है गढ़ता।
उसी अनुरूप मुझे,उंगलियों पर रगड़ता।।
तुम थिरक थिरक कर, नाच दिखाती।
कठपुतली नाम से, तुम जानी जाती।।
उसने मेरा सहारा लेकर, तुम्हे बना दिया सजीव।
अपनी कहानियों मे गढ़कर,कर दिया प्रसिद्ध।।
मेरा और कलाकार का, नही होता है नाम।
सभी लोग लेते है ,बस कठपुतली का नाम।।
कठपुतली की समझ मे आ गई,धागे की सब बात।
उसे हुआ एहसास,धागे के संग है मेरा सच्चा साथ।।
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