हाड़ी रानी की अंतिम निशानी
यह कहानी सलुम्बर के सरदार राव रतन सिंह चुण्डावत तथा हाड़ी रानी की है।जिसे मैंने कविता मे पिरोने की कोशिश की है। मुझे उम्मीद है कि रचना को पढ़कर आपको ऐसा लगेगा जैसे आपने पूरी कहानी पढ़ ली।
सुनो सुनाऊं एक कहानी,
हाड़ी रानी चुण्डावत राव की।
मेवाड़ का थी वो अभिमान,
नारीयों का स्वाभीमान थी।।१।।
न हाथों की मेहंदी छूटी,
न छूटा पैरों का महावर था।
राणा का सन्देश लेकर,
द्वार पर खड़ा सन्देशवाहक था।।२।।
वीरवर! अविलंब सैन्य टुकड़ी लेकर,
रोको औरंगजेब की सेना को।
विलंब न करते हुए सरदार ने,
कूच करने का दिया आदेश सेना को।।३।।
केसरिया बाना पहने वीरवेष मे,
अन्तिम विदाई हेतु पहुंचा सरदार।
रानी चौकी,थी अचंभित, कहा
क्षत्राणियां इसी दिन का करती इन्तजार।।४।।
फिर भेंट हो न हो,
सरदार का मन आशंकित था।
कहीं प्रियतमा न दे बिसार,
चुण्डाराव का मन सशंकित था।।५।।
दोनो की आंखें थी भरी,
एक दूजे से अश्रु छुपा रहे।
रानी ने प्रियतम को विदा किया,
अधरो पर मुस्कान लिए।।६।।
आप करें विजय श्री प्राप्त,
हमारा जन्मजन्मांतर का साथ।
जीवन के अंतिम क्षण तक,
प्रियवर करूंगी आपका इंतजार।।७।।
सरदार हवा से बातें करता,
पवन वेग से उड़ चला।
रह-रह नेत्र समक्ष घूम रहा,
रानी का सलोना मुखड़ा।८।।
सरदार का मन सशंकित था,
कहीं प्रियतमा ने दे बिसार।
प्रिय अपनी प्रिय निशानी देना लिख,
पत्रवाहक से पत्र भेजा रानी के पास।।९।।
पत्र पढ़ हुई रानी हैरान,
राजा का मन मुझमे लगा रहा,
कैसे करेंगे विजयश्री का वरण?
कैसे मातृभूमि की करेंगे रक्षा? ।।१०।।
रानी ने खत लिखा हे स्वामी,
मैं भेज रही हूं अंतिम निशानी।
मोह के सभी बंधन रही हूं काट,
स्वर्ग में जोंहुगी तुम्हारी बाट।।११।।
कटि से निकाला कृपाण,
कंठ पर तेजी से किया प्रहार।
सिर धड़ से हो गया अलग,
वह धरती पर गया लुढ़क।।१२।।
स्वर्ण थाल में रखा मस्तक,
सुहाग चूनर से ढककर।
सैनिक पहुंचा राव के पास,
राव देख रह गया अवाक।।१३।।
ललाट कंठ मे लटकाकर,
राव ने अप्रतिम शौर्य दिखाया।
दुश्मनों के होश उड़ाकर,
औरंगजेब को मार भगाया।।१४।।
धरती रोई अंबर रोया,
हाड़ी रानी की कुर्बानी से।
कृतज्ञ हो गई मातृभूमि,
रानी के अमर बलिदान से।।१५।।
कर्त्तव्य का पाठ पढ़ाया,
रानी तूने अपने त्याग से।
कोटि-कोटि नमन तुझे,
अमर हुआ तेरा समर्पण ये।।१६।।
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