चकवा चकवी का दर्द


सुनहरा रंग मंजुल पर, शाश्वत
प्रेम प्रतीक चकवा चकवी।
दोनो युगल प्रेम मे मगन,
दिन भर खेलें अठखेली।।१।।

दिन ढलने लगा रात होने लगी,
न जाने क्यों दोनों हुए व्याकुल?
अभिशापित चकवा चकवी,
एक दूजे से हो गए विमुख।।२।।

एक नदी के इस पार,
दूजा नदी के उस पार।
दिल मे दर्द कसक टीस संग,
विरह मे कट रही काली रात।।३।।

वियोगिन गा रही विरह गीत,
झर झर बह रहे नयनो से नीर।
दोनो एक दूसरे को पूकारते,
तड़प तड़प कर रात बिताते।।४।।

सूर्योदय हुआ,
बन्द हुआ उनका क्रनंदन।
चकवा चकवी फिर मिले,
जैसे जल रहे हो प्रेम अगन।।५।।

बन्द कर दो पिंजरे मे अगर,सूर्यास्त 
होते ही हो जाते विलग मगर।
एक का मुख पूरब की ओर,
दूजे का मुख पश्चिम की ओर।।६।।

हर रात विरक्त हो जाते,
पर प्रेम न किंचित होता कम?
भोर होते ही प्रेम परवान चढ़ता,
चकवा चकवी का प्रेम निश्छल।।७।।

कोई न मारो इनको,
विरह के मारे हैं।
जी लेने दो इनको,
रात भर हर पल मरते हैं।।८।।


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