पन्ना धाय का बलिदान
जल रहा था चित्तौड़ किला,
आन्तरिक विरोधो षणयन्त्रो से।
माता कर्मावती को संशय हुआ,
भावी राणा का जीवन खतरे में।।१।।
पुत्र उदय सिंह को सौप दिया,
पन्ना धाय के आंचल मे।
पन्ना इस कुल की रक्षा कर,
मेवाड़ राजवंश है खतरे मे।।२।।
पन्ना ने वचन दिया,
निज कुंवर पर न आंच आने दूंगी।
दे दूंगी अपने प्राण पर,
मेवाड़ का कुलदीपक न बुझने दूंगी।।३।।
दुष्ट क्रूर दासी पुत्र बनवीर,
सत्ता लोभी था व्यभिचार।
काली रात का साया बन,
मंडरा रहा था मेवाड़ पर।।४।।
बनवीर पागल हाथी सम,
चल पड़ा रक्तरंजित तलवार लिए।
आंखो मे खूनी ज्वाला भर,
चल पड़ा राणा का लहू पीने।।५।।
विश्वस्त सेवक ने दिया सन्देश,
पन्ना धाय बनवीर आ रहा यमवेश।
पन्ना न किंचित भयभीत हुई?
अडिग चट्टान बन खड़ी हुई।।६।।
नज़रें फेरी उदय चंदन पर,
उदय चंदन लग रहे थे पूरक।
मन में विचार कौंध गया,
क्यों न बना दूं चंदन को उदय?७।।
बांस की टोकरी मे,
झटपट उदय को सुला दिया।
ऊपर झूठे पत्तल रखकर,
कीरतबारी ने किले को पार किया।।८।।
फिर आंख के तारे को,
बिछौने से उठा सीने से लगा लिया।
राजसी वस्त्राभूषण पहनाकर,
उदय सिंह के पलंग पर सुला दिया।।९।।
कहां है उदय? कहां है राणा?
उसका मर्दन करने मै आया।
तूफान सा गरजता बरसता,
हत्यारा बनवीर आ खड़ा हुआ।।१०।।
हदय को पाषाण कर,
कर चंदन की ओर इंगित किया।
चंदन को उदय समझ कृपाण उठा,
नन्हे दुलारे के टुकड़े टुकड़े किया।।११।।
धन्य है मां धन्य है तेरी स्वामीभक्ति,
चंदन का अन्तर्मन बोल उठा।
उदय सिंह के प्राणो की रक्षा कर,
तेरा चंदन वीरगति को प्राप्त हुआ।।१२।।
धरती कांपी अंबर कांपा,
पर तूने नेत्रो से आंसू न बहाया।
तू धर्मपरायण कर्तव्यपरायण,
स्वामीधर्म पर पुत्र कुर्बान किया।।१३।।
पन्ना तुझे शत् शत् नमन,
तेरा त्याग समर्पण अमर हुआ।
तेरी स्वामीभक्ति बलिदान से,
देश को महाराणा प्रताप मिला।।१४।।
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