कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक बन गया महान
धौली की पहाड़ी पर हुआ कलिंग संग्राम,
युद्ध जीत गया अशोक सम्राट।
कलिंग राजा अनंत पद्मनाभन मारा गया,
परंतु कलिंग द्वार अब भी ना खुला।।१।।
अशोक ने कलिंग द्वार की ओर रूख किया,
बज रही दुदुम्भी जय जयकारा गूंज रहा।
कलिंग द्वार खुल गया ,
सैन्य वेश मे घोड़े पर सवार खड़ी थी पद्मा।।२।।
युद्ध के लिए ललकार रही,
दुर्गा भवानी सा हुंकार रही।
हे सम्राट उठाओ हथियार,
और हमसे करो युद्ध।।३।।
स्त्रियों पर शस्त्र उठाना,
शास्त्रानुसार है अधर्म।
हे कलिंग वीरांगना,
मैं नही करता अन्याय।।४।।
मासूमों की हत्या करना,
क्या नही है अधर्म?
तुमने न्याय अन्याय की चिंता अब की है?
लाखों निर्दोषो को उतार दिया मौत के घाट।।५।।
सिर झुकाए क्यों खड़े हो?
देखो कैसे रणभूमी है लहूलुहान?
मेदनी हुई शोणित कीच,
दया नदी है रक्तरंजित।।६।।
हे महीप कलिंग विजय कर,
कर लिया साम्राज्य विस्तार।
बना लिया अखण्ड भारत,
क्या शबो पर करेगा शासन?।।७।।
छाया है चहुं ओर मातम,
इतिहास करेगा तुझसे सवाल।
कहां है आंखो का आलोक?
क्या कहेगा सम्राट अशोक?।।८।।
टूट गई हाथो की चूड़ियां,
मिट गया मांग का सिंदूर।
छिन गया आंख का आलोक,
असमय अनाथ हुए मुकुल।।९।।
ध्वज टेक कर खड़ा है उदास,
अब क्यों कर रहा है संताप।
कहां है नृप का अहमित्व?
सिर पर तेरे हत्या का दायित्व।।१०।।
पटा है लाशो से रणखेत,
नोच रहे हैं श्वान- गिद्ध।
असहनीय दर्द से रहे कराह,
यम सा तांडव मचाते श्रंगाल।।११।।
लजाकर छिप गया दिनमान,
स्तब्ध है आकाश।
छा गया है तम,
विधु को घन ने लिया ढांक।।१२।।
युद्ध का दृश्य देखकर,
कांप उठा मगध सम्राट।
हासत्रास सत्यानाश,
हदय विदारक युद्ध परिणाम।।१४।।
रूदन कर रही अवलाए,
वृद्ध चीत्कार पुकार रहे।
चहुं ओर गूंज रही आवाज,
श्रव्य भी न है स्वर करूण।।१५।।
सुन पद्मा वचन सम्राट,
कानो मे गूंज रही आवाज।
हुआ हदय विचलित नृपाल,
कैसी यह व्यथा अपार।।१६।।
धरा पर गिर गया प्रताप,
कुकृत्यो पर कर रहा विलाप।
नेत्रो से झर झर बह रहा अंबु,
घायल महीप कर रहा परिताप।।१७।।
युद्ध के पश्चात् रणक्षेत्र,
बन गया था मरघट।
जीत कर भी हार गया,
नया कलिंग महाराज।।१८।।
हे कलिंग राजकुमारी पद्मा,
मुझसे हो गई भूल,करें मुझे क्षमा।
कभी नही उठेगी अब यह तलवार,
आप कलिंग राज्य पर करें शासन।।१९।।
व्याकुलचित सम्राट अशोक,
पहुंचा बुद्ध शरण, करने मन शांत।
त्याग कर अहिंसा का मार्ग,
स्वीकारा बौद्ध धर्म, शांति की राह।।२०।।
एस धम्मो सनंतनो,
बुद्धम शरणं गच्छामि।
धम्मं शरणं गच्छामि,
संघ शरणं गच्छामि।।२१।।
कलिंग युद्ध के पश्चात्,
नही किया कोई युद्ध।
प्रजा की भलाई कल्याण मे,
बिताया अपना शुक्र।।२२।।
प्रजा का सुख दुख जानने,
घर घर स्वयं जाता भूपाल।
प्रेम परोपकार दया दान कर,
बन गया सम्राट अशोक महान।।२३।।
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