यम-विजयिनी: सती सावित्री





अटल अनुष्ठान सिद्धि उपरांत,
सतयुग  में   जन्मी।
दृढ़   संकल्पी   विदुषी,
असाधारण कन्या सावित्री।।१

अद्वितीय सौंदर्य ओज,
विलक्षण-प्रतिभा वैदुष्य।
वेद-वेदांग शास्त्र में निपुण,
सावित्री   थी   धर्मज्ञ।।२

तरूणाई आई आगया,
समय   स्वयंवर   का।
सावित्री ने सत्यवान को,
मन ही मन पति चुना।।३

कामदेव-सम    सुंदर,
बलिष्ठ पराक्रमी साहसी।
सत्यवादी उदार धैर्यवान,
परन्तु अल्पायु था सत्यवान।।४

माता नेत्रहीन-पिता संग,
सत्यवान रहता वन।
राज्य छिन जाने से,
आश्रम में करते तप।।५

शुभ मुहूर्त में सावित्री का,
विवाह हुआ सत्यवान संग।
सास-ससुर पति की सेवा करती,
नियम पूर्वक करती उपवास व्रत।।६

सत्यवान की आयु के,
मात्र चार दिन शेष बचे।
सावित्री ने त्याग दिया अन्न-जल,
कठोर व्रत-साधना मे गई लग।।७

अरण्य की ओर चल पड़ा,
लकड़ी काटने सत्यवान।
सावित्री  भी  संग  गई,
मृत्यु का अन्तिम दिन आज।।८

कराहने लगा सत्यवान,
काष्ठ  काटते  वक्त।
देह में हो रही पीड़ा,
लेट गया  भू पर।।९

सावित्री ने सत्यवान का,
शीश अंक में रखा।
और  आंचल  से,
झलने लगी पंखा।।१०

सहसा सावित्री ने देखा,
एक असाधारण पुरुष।
वसन माणिक वपु कृष्ण,
सिर पर मणि- मुकुट।।११

एक हस्त रस्सी का टुकड़ा,
दूजे कर पकड़ रखा गदा।
सावित्री ने पूछा साहस-धर,
आप कौन हैं महात्मन ?१२

मैं  सूर्य-पुत्र   यम,
सत्यवान को लेने आया।
सत्यवान की आयु,
हो चुकी क्षीण अब।।१३

दक्षिण दिशा चल दिया यमराज,
सत्यवान की जीवात्मा लेकर।
सावित्री भी चलने लगी,
धर्मराज के अनुगमन।।१४

सावित्री की दृढ़ निष्ठा पतिव्रत देख,
मृत्युपति  हुए  प्रसन्न।
बोले!सत्यवान का जीवन छोड़,
मांग लो तुम तीन वर।।१५

ससुर का राज्य नेत्र-ज्योति,
पिता को सौ यशस्वी पुत्र।
औ सौ तेजवान यशस्वी पुत्र,
मुझे प्रदान करे भानुज।।१६

एवमस्तु! कृतांत बोले,
अब गृह लौट जाओ।
सावित्री बोली!कैसे लौट जाऊं,
मैं कुलीन पतिव्रता स्त्री हूं।।१७

बिन पति सौ तेजवान यशस्वी पुत्र,
की प्राप्ति क्या है धर्म सम्मत?
आप वचनों की रक्षा हेतु,
मेरा पति लौटाए दण्धर।।१८

सावित्री तू धन्य है,
श्राद्धदेव ने कहा।
तेरे वैदुष्य चातुर्य पतिव्रत्य,
से मैं पराजित हुआ।।१९

संसार तेरी जैसी सती नारियों,
के समक्ष रहेगा नतमस्तक ।
संसार में तेरी कीर्ति अमर हो,
अन्तक ने जीवात्मा को कर दिया मुक्त।।२०



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