सावन की घटा


छाई सावन की घनघोर घटा,
धरणी ने धानी आवरण धरा।
श्यामल घटा   दिनकर छिपा,
सर-सर चली शीतल हवा‌।।

विरहिन का इंतजार खतम हुआ,
पीहु-पीहु पपीहा मधुर बोल रहा।
कुहू-कुहू बोल लाजवंती रही लजा,
दादुर टर्र-टर्र शोर मचा रहा।।

तरू-पल्लव खुशी से झूम उठे,
डाली-डाली कुसुम मुस्का रहे।
सरिता ने फैलाया आंचल अपना,
जोर-जोर से बरसी सावन की घटा।।

घुमड़ - घुमड़ के गरजे बदरा,
छमक - छमक के बरसे बरखा।
पर्वतों ने वृष्टि का आलिंगन किया,
वसुंधरा ने बरखा का रसपान किया।।

छाई हरियाली,प्रकृति का अंग-अंग खिला,
मनमोहक - सुगंधित वातावरण हुआ।
भर गए ताल-तड़ाग,हंस-हंसावर करें क्रीड़ा,
मिलिंद गुनगुनाए,पंख फैला ध्वजी झूमा।।

कलियां खिली डाली-डाली झूमीं,
पवन संग खेले आंख मिचौली।
धरणी से नेह लगाए नील-गगन,
झम-झम बरसे सावन की घटा।।




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