सुषमा बिखेरती


शरद ऋतु की अतुलित आभा,
बिखेरती प्राकृतिक सुषमा।
स्फटिक-आकाश तैरते हुए,
उभरे बादल कपासनुमा।।

बूंद - बूंद         बरसता,
अचला की प्यास बुझाता।
सोंधी - सोंधी   खुशबू से,
मही का आंगन महकाता।।

नभ से गिरती ओस की बूंद,
पल्लव- पल्लव पर दमकती।
जैसे तरू ने बिखराए हो,
पात पर शबनम के मोती।।

मंद-मंद चलती मधुर हवा,
पत्र पर करती हलचल।
तरू नीड़ में सोते परिंदे,
नेत्र खोल करते कलरव।।

झर - झर झरता झरना,
कल - कल बहती आपगा।
जल-क्रीड़ा करते मराल, 
सुशोभित होता कल्हार।।

कोयल कूकती शाख पर,
तितलियां चूमती सुमन,
डाली-डाली डोले भंवरा,
चहुंओर  करें   गुंजन।।

रंग-बिरंगे      सारंग,
शोभा बढ़ाते उपवन।
पंखुड़ी खोलता पंकज,
प्रदीप्त होता सरोवर।।

खग उड़ते उन्मुक्त गगन,
लेकर     नव       उमंग।
मालती  लिपटी तरूवर,
नव      कोंपलों      संग।।

कानन-कानन महकता,
सौरभ फैलाता पुष्प।
देख प्रकृति की अनुपम छटा,
अतुलित मन होता खुश।।



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