धर्मयुद्ध

 

हे भारत के वीर सपूतों,
उठो बढ़ाओ आगे कदम।
करो एक बार फिर तुम,
  धर्मयुद्ध ! धर्मयुद्ध !

धर्म कभी झूके नही,
अधर्म कभी डटे नही।
सत्य का प्रकाश हो,
अन्धकार का नाश हो।।

मातृभूमि के भाल पर,
ना आने पाए कोई आंच।
उनका सर कलम कर,
मातृभूमि की ओर उठे जो आंख।।

धधक उठी है चिंगारी,
उर मे लगी जो आग।
कर दो समूल नाश,
जो देश को दीमक की तरह रहे चाट।।

तुम हो भारत के प्रहरी,
रख लो तिरंगे की लाज।
अहि का करो पर्दाफाश,
जो मातृभूमि को बेच रहे आज।।

बांध लो सर पर कफ़न,
कर दो अरि को दफन।
उतार दो सब ऋण,
जो समर-भूमि में दे गये प्राण।।

सत्य का हो रहा मर्दन,
धर्म का हो रहा खंडन।
बन   जाओ   सुदर्शन,
करो एक बार फिर तुम
  धर्मयुद्ध ! धर्मयुद्ध !

                                     


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