देशभक्त परिंदे


उड़ चला नील गगन मे,
एक पंछी का जोड़ा।
लेकर तमन्ना सरहद पर,
फहराऊ तिरंगा।।

बाज-सा ले हौसला,
उड़ रहे तुंग-गगन मे।
तभी बादलों ने,
आसमान को आ घेरा।।

झम-झम बरसा पानी,
दोनो भीग रहे थे।
भीगे परिंदे,
वृक्ष पर जा बैठे।।

दोनो गुनगुना रहे,
देशभक्ति तराने।
करने लगे इन्तजार,
रूकजाए बरसात।।

तभी आहट-सी हुई,
शिकारी ने साधा निशाना।
उड़ चले सरहद की ओर,
आंखों मे लेकर अंगारा।।

उर मे लगा आकर शर,
दोनो गिरे जमीं पर।
सर-सर बह रहा रक्त,
फिर भी दोनो थे मस्त।।

अहेरी से बोले परिंदे,
पूरी कर दो अन्तिम इच्छा।
हां-हां ! बताओ क्या है?
तुम्हारी अन्तिम इच्छा।।

मरने से पहले हम,
सरहद को चूमकर।
चाहते हैं फहराना,
आजादी का तिरंगा।।

यह सुनते ही,
आखेटक हुआ शर्मिन्दा।
रोम-रोम उसका,
आत्मग्लानि से भरगया।।

झर-झर बह रहे अश्रु,लेकर
पहुंचा समर-भूमि पर।
चूमी सरहद की माटी
होकर नतमस्तक।।

तिरंगा फहराकर,
प्राण दिया त्याग।
व्याध बोला!हे देशभक्त परिंदे,
मुझ अधम को कर दो माफ।।

तिरंगे मे लिपटाकर,
दोनो को किया प्रणाम।
तुम्हे शत-शत नमन,
तुम देश पर हो गए कुर्बान।।



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