बेटी का दर्द


मैं बाबा की नन्ही गुड़िया,
थी दुनिया से अनजान।
हंसती खेलती मस्ती करती,
मासूम कली थी नादान।।

अभी तो सीख रही थी,
ढंग से बोल बोलना।
तुतला-तुतला कर बुलाती,
अंकल ताऊ प्यारे भैया।।

बेटी कहकर संग खेलता,
हंसाता दुलारता प्यार करता।
टाफी चाकलेट भी खिलाता,
अपनापन खूब लुटाता।।

अम्मा-बाबा खुश होते,
कहते बन्दा है अच्छा इंसान।
हमारी बेटी को मानता है,
शायद वह भी थे अंजान।।

जिसे मैं बुलाती थी,
अंकल ताऊ प्यारे भैया।
उसकी बुरी नजर थी मुझ पर,
वह बहसी दरिन्दा निकला।।

उस पापी कपटी अधर्मी ने,
मासूमियत का कत्ल कर दिया
नोचा मारा पीटा मुझको,
इज्जत को तार-तार कर दीया।।

मै रोती चिल्लाती रही,
अम्मा-बाबा को बुलाती रही।
उसको तनिक भी आई न दया,
मेरे जीवन का अन्त कर दिया।।

अम्मा-बाबा अब ना लाना,
तुम मुझको धरती पर।
कोख अपनी उजाड़ देना,
स्वयं बचाना अपनी इज्जत।।

मै अपना दर्द किससे कहूं,
अम्मा-बाबा के दुख कैसे हरूं?
कैसे मुझको न्याय मिलेगा,
कैसे घर आंगन बचेंगी बेटियां?

अम्मा मेरी विनती सुन लो,
उस कपटी को फांसी दिलवाओ।
या चौराहे पर लटकाकर,
उसकी बोटी-बोटी कटवाओ।।

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