छीना आशियाना

गौरैया जब तुम आती हो,
मन हर्षित कर जाती हो।
दाना चुगती पानी पीती,
इधर उधर मंडराती हो।।

कभी अमरूद की शाख पर,
कभी फूलों की डाल पर।
जब तुम सुस्ताती हो, घर
खुशीयों से भर जाती हो।।

पर अब कुछ उदास सी रहती हो
जैसे कुछ कहना चाहती हो।
तुम्हारे संगी साथी भी नही आते,
तुम तनहा-तनहा सी दिखती हो।।

शायद तपती धूप से बेहाल हो,
ऊंची-ऊंची मिनारों से परेशान हो।
सीमेंट के साम्राज्य ने छीन लिया,
तुमसे तुम्हारा ही आशियाना।।

अब न रहे कोटर,न दरख़्त,
न सुनाई देता पक्षियों का कलरव।
मरू हो गई यह धरा,
जल का स्तर घट रहा,
कहीं छिन न जाए?
मानव तेरा भी आशियाना।।



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