नारी ने हार कहां मानी

 

नारी ने हार कहां मानी


जब-जब विपदा पड़ी भारी,

नारी ने हार कहां मानी।

चंचल-चपल कुशाग्रबुद्धि, 

सब्र धीरज धर भृकुटी तानी।।


ना आंच आने दी परिवार पर,

उठ खड़ी हुई बनी सहचर।

जब - जब उठी गलत नजर,

फोड़ी आंख बाज बनकर।।


एक ही सपना नैनो ने पाला,

जीना बस स्वाभिमान से जीना।

कम से कम मे कर लेंगे गुजारा,

पर ईमान ना कभी खोना।।


हर हालात पर रखती पैनी नजर,

ना घबराती आए कैसा भी तूफान।

हिम्मत-हौसला भी रखती साथ,

परिवार खातिर बन जाती भगवान।।


हंसती-मुस्कुराती घर संभालती,

बाहर भी खुद्दारी से करती काम।

ना जाने कितनी पीढ़ियां संवारती,

मात पिता का रोशन करती नाम।


©® प्रियंका त्रिपाठी 'पांडेय'

प्रयागराज उत्तर प्रदेश

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जब-जब विपदा पड़ी भारी,
नारी ने हार कहां मानी।
चंचल-चपल कुशाग्रबुद्धि,
सब्र धीरज धर भृकुटी तानी।।

ना आंच आने दी परिवार पर
उठ खड़ी हुई बनी मेरूदण्ड।
जब - जब उठी गलत नजर,
फोड़ी आंख बाज बनकर।।

एक ही सपना नैनो मे पाला,
जीना बस स्वाभिमान से जीना।
कम से कम मे कर लेंगे गुजारा,
पर ईमान ना कभी अपना बेचना।।

हर हालात पर रखती पैनी नजर,
हिम्मत-हौसले से लेती काम मगर।
ना घबराती आजाए कैसा भी तूफान?
परिवार खातिर बन जाती सेतु-बांध।।

हंसती-मुस्कुराती घर संभालती,
ना जाने कितनी पीढ़ियां संवारती?
बाहर भी खुद्दारी से करती काम,
कुटुंब का करती हरदम सम्मान।।




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