धृतराष्ट्र



पुत्र मोह में फंसा,
था ॴधर धृतराष्ट्र।
भरतकुल किया कलंकित,
चन्द्रवंश  का  सत्यानाश।।

अपनी महत्वाकांक्षा को,
नाम दिया दुर्योधन अड़।
तथा अनुज भ्राता पांडु,
पुत्रो को किया बेघर।।

सब्र धीरज धैर्य का,
मोल चुकाया पांडव ने।
बारह वर्ष तथा एक साल,
अज्ञातवास बिताया पांडव ने।।

इंद्रप्रस्थ के बदले पांच गांव,
मांगा वह भी ना दे सका।
कहा जहां हो वहीं रहो,
इसी मे है सबका भला।।

पर नही था मंजूर,
छोड़ना अपना हक।
चाहे क्यों ना करना पड़े,
अपनो से महायुद्ध।।

एक तरफ पांडव सेना,
दूसरी तरफ कौरव सेना।
कौरव संग थे महारथी,
पांडव संग सुदर्शनधारी।।

अपनो को सामने देखकर,
अर्जुन हुआ भाव-विभोर।
कैसे शस्त्र उठाए अपनों पर?
नारायण से करने लगा प्रश्न।।

मन्द-मन्द मुस्काए कृष्ण,
बोले पार्थ यह है धर्मयुद्ध।
बताया जीवन-मरण का भेद,
दिया गीता उपदेश।।

जहां धर्म वहां मैं,
जहां मैं वहां सत्य।
जहां सत्य वहां विजय,
निश्चित अधर्म पराजय।।

हे कौन्तेय उठाओ गाण्डीव,
करो धर्मयुद्ध।
महाबली से महाबली,
सेना से सेना लड़ी।।

मुंड गिरे कट-कट,
लाशें बिछी भूमि पर।
मेदनी हुई लोहित,
गिद्धों का था निमंत्रण।।

अठारह दिन चला युद्ध,
कौरवो का हुआ अन्त।
ना पूरी हुई महत्वाकांक्षा,
धृतराष्ट्र का खतम वंश।।

अधर्म पराभूत,
धर्म     रक्षित।
धर्मराज बने नृप,
सत्य उद्भाषित।।



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