चंचल मन
चंचल मन मेरा कह रहा,
जो मैं तितली बन जाऊं।
डाली-डाली बाड़ी-बाड़ी,
फिरू,यौवन पर इतराऊं।
जो मैं भंवरा बन जाऊं,
गुन-गुन मधुर गीत गाऊं।
झूमे - मुस्काए कलियां,
खेलें प्यारी अठखेलियां।।
जो मैं झरना बन जाऊं,
झर-झर गिरती जाऊं।
नदियों संग मिलकर,
कलकल संगीत सुनाऊं।।
जो मैं कुसुम बन जाऊं,
उपवन की सुंदरता बढ़ाऊं,
रंग बिरंगे पुष्पो से मिल,
चमन में सौरभ फैलाऊं।।
जो मै हवा बन जाऊं,
समर-भूमि में जाकर।
वीरो के मस्तक चूमू,
अपने भाग्य पर इठलाऊं।।
जो मैं परिंदा बन जाऊं,
पंख पसार उड़ जाऊं।
उन्मुक्त गगन में उड़ने का सुख,
क्या है धरा को बताऊं।।
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