सांझ धरा का मिलन
स्वर्ण रथ पर सवार,
दुल्हा सा बन- ठन।
दमक रहा दिनकर,
पहन केसरिया वसन।।
प्रकृति रही निहार,
कर नव-वधू श्रंगार।
सिंदूरी रंग रंगा अंबर,
बिछा रहा पितांबर।।
सजा स्वर्णिम सेज,
शिथिल पग,प्रतिची आकृष्ट।
सांझ-धरा का मिलन,
हो रहा क्षितिज पर।।
पशु पक्षी,
लौट रहे गेह।
गोधीली बेला,
दे रहे संदेश।।
नदी तीरे सुन्दरी,
देख स्वर्णिम-आभा।
लजाती मुस्काती,
देख सपनो का राजा।।
शीतल बयार,
भ्रमर गुंजन।
टकराते पात - पात,
जैसे नटि करे नर्तन।।
घना तम चादर,
बिछा रहा नभ।
मुस्काया चन्द्र।
झिलमिलाए तारक-गण।।
ज्योति प्रखर,
चन्द्रिका संग।
कर रहे विश्राम,
सभी श्रान्त मन।।
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