बत्ती गुल


कल दिन रात जब ,
बत्ती हो गई गुल।
टीवी मोबाइल कम्प्यूटर छोड़,
सब बैठे एक दूजे संग फुल।।

ना वाट्स अप पर,
आया कोई मैसेज।
ना फेसबुक ने भेजा,
कोई नोटिफिकेशन।।

सबने अपनी अपनी कही,
फिर खूब लगे ठहाके।
याद आया गुजरा जमाना,
तब कैसे होते थे याराने।।

सब हो गए बातों में मशगूल,
ना लगी किसी को भूख।
काम की हो गई छुट्टी,
औरतो को मिल गई जनम घुट्टी।।

दिल हो गए सबके साफ,
जिसपर बरसों से पड़ी थी धूल।
भला हो उस बिजली वाले का,
जिसने बत्ती कर दी गुल।।


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