नियत में खोट




अच्छा हुआ ईश्वर ने जो,
पर नही दिया मनुज को।
देकर देख ली सकल भूमि,
क्या से क्या बना दिया धरा को।।

उदर की भूख इतनी बड़ी कि,
कम पड़ रही सकल भूमि भी।
प्रभु से करता नित्य शिकायत,
क्यों नही दिया पर मनुज को?

जो पर होते मेरे पास,
काट - छाॅ॑ट देते नभ।
गगन भी बाॅ॑ट देते हम,
जैसे बाॅ॑टते जाती धर्म।।

सभी जानते है धरती का,
एक तिहाई जल धरा पर।
फिर भी आज का मनुज,
तरस रहा है बूंद - बूंद को।।

मनुष्य को छोड़कर,
जितने भी प्राणी है धरा पर।
करते सृष्टि संचालन कार्य,पर
मनुज हर क्षण पहुंचा रहा चोट,
इसकी नियत में है खोट।।



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